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दिल्ली सल्तनत का तुगलक वंश : फ़िरोज़शाह तुग़लक़

तुगलक वंश:1320-1414 ई.

दिल्ली सल्तनत का तुगलक वंश : फ़िरोज़शाह तुग़लक़

 फ़िरोज़शाह तुग़लक़:1351 - 1388 ई.

फ़िरोज़ शाह तुग़लक़ दिल्ली सल्तनत में तुग़लक़ वंश का शासक था। फ़िरोजशाह तुग़लक़ का जन्म 1309  को हुआ। मुहम्मद बिन तुग़लक़ का चचेरा भाई एवं सिपहसलार 'रजब' का पुत्र था।उसने एक गुज्जर जाति  की महिला से विवाह किया,  उसने एक गुज्जर जाती की महिला से विवाह किया। 

मुहम्मद बिन तुग़लक़ की मुत्यु के बाद 20 मार्च 1351 को फ़िरोज़ तुग़लक़ का राज्याभिषक थट्टा के निकट हुआ। पुनः फ़िरोज़ का राज्याभिषेक दिल्ली में अगस्त, 1351 में हुआ। सुल्तान बनने के बाद फ़िरोज़शाह तुग़लक़ ने सभी क़र्ज़े माफ कर दिए, जिसमें 'सोंधर ऋण' भी शामिल था, जो मुहम्मद तुग़लक़ के समय किसानों को दिया गया था। फ़िरोज़शाह तुग़लक़ ,भारत पर अन्तिम मुस्लिम  शासक था। उसने अपने शासनकाल में ही चांदी के सिक्के चलाये |

फ़िरोज़शाह तुग़लक़ को काँटों का ताज मिला था उसके सामने निम्न समस्याएं थी

1. साम्राज्य के विघटन कि समस्या 

2. किसानो का अंसतोष  

3. अमीर वर्गों का असंतोष 

4. सैनिक वर्गों का असंतोष

5. उलेमा वर्गों का असंतोष 

6. राज्य का ख़ाली खजाना

फ़िरोज़शाह तुग़लक़ इन समस्याओं को एक एक करके समाधान किया

1. साम्राज्य के विघटन कि समस्या:

मोहम्मद बिन तुगलक के शासन के अंतिम वर्षो में कई क्षेत्र स्वत्रंत हो गए,फ़िरोज़शाह तुग़लक़ ने व्यावहारिक   बुध्दि  का सहारा लिया और उन क्षेत्रों को दोबारा जीतने का प्रयास नहीं किय। 

1. बंगाल का प्रथम अभियान(1353) - बंगाल के शासक इलियास शाह था इसने अपनी राजधानी पंडुवा को छोड़कर इकदला किले में शरण ली ,फिरोज किला जीतने में असफल रहा अतः 1355 में संधि करके वापस आ गया

2. बंगाल का द्वितीय अभियान (1359) - बंगाल  के शासक सिकन्दरशाह था उसने भी  इकदला किले में शरण ली ,फिरोज किला जीतने में असफल रहा।  बंगाल अभियान से वापस लौटते समय फिरोजशाह ने जौना खां(मोहम्मद बिन तुगलक) के नाम जौनपुर नामक नगर बसाया। 

3. उड़ीसा अभियान(1360) - बंगाल अभियान से लौटते समाया उड़ीसा के गंग वंश के शासको पर हमला किया और पूरी स्थित जगन्नाथ मंदिर व जाज नगर को लुटा। 

4. नगरकोट अभियान (1361 )  - फ़िरोज़ ने नगरकोट पर आक्रमण किया। इस  अभियान में फिरोज ने ज्वालामुखी मंदिर को खूब लुटा। यहां सुल्तान ने ज्वालामुखी की मूर्तियों को तोड़कर ,गाय के मांस में मिलाकर,उसके गंध के बने थैले को ब्राह्मणो के गले में लटकवा दिया।  

इसी अभियान के में उसने 1300 संस्कृत ग्रंथो का फ़ारसी में अनुवाद करवाया ,जिसमे से एक का नाम दलाल-ए-फिरोजशाही था।

5. सिंध अभियान(1361) - फ़िरोज़ ने सिंध के शासक जामबाबनियों के विरुद्ध अभियान किया। सुल्तान की सेना लगभग 6 महीने तक रन के रेगिस्तान में फँसी रही, कालान्तर में जामबाबनियों ने सुल्तान की अधीनता को स्वीकार कर लिया और वार्षिक कर देने के लिए सहमत हो गये।

किसानो का अंसतोष :

मोहम्मद बिन तुगलक के शासनकाल में कृषको को ऋण दिए गए थे। कृषको में इस बात का असंतोष था की ऋण वापस न करने पर उनकी जमीन जप्त कर ली जाएगी। फिरोजशाह  ने किसानो को ऋण से मुक्त कर दिया ,ऋण  से सबंधित  रजिस्टर को रद्द करने का आदेश दिया। 

फिरोजशाह ने सिंचाई हेतु 11 नहरों (सर्वाधिक) का निर्माण करवाया - वह प्रथम सुल्तान था जिसने सिंचाई (हक ए शर्ब) कर भी लगाया था जो कुल उतपादन का 1 /10 भाग होता था

3. अमीर वर्गों का असंतोष :

असैनिक व सैनिक पदों को वंशानुगत कर दिया। उसने यह नियम बनाया कि अगर किसी सैनिक कि मृत्यु होती है तो वह पद उसके पुत्र को प्राप्त होगा और पुत्र नहीं है तो दामाद को और दामाद नहीं है तो दास को प्राप्त होगा। 

4. सैनिक वर्गों का असंतोष:

फिरोज ने सेनिको को संतोष करने के लिए भ्रष्टाचार पर कठोरता से अंकुश नहीं लगाया इसके अलावा उसने स्वयं को भ्रष्टाचार के लिए प्रोत्साहित किया। 

5. उलेमा वर्गों का असंतोष :

फिरोज ने कट्टर धार्मिक नीति अपनाकर इस वर्ग को संतुष्ट करने का प्रयास किया  फिरोज पहला ऐसा सुल्तान था जिसने इस्लाम धर्म को राज्य शासन का आधार बनाया

फ़िरोज़ ने अपने शासन काल में 24 कष्टदायक करों को समाप्त कर दिया और केवल 4 कर ‘ख़राज’ (लगान), ‘खुम्स’ (युद्ध में लूट का माल), ‘जज़िया’, एवं 'ज़कात' (इस्लाम धर्म के अनुसार अढ़ाई प्रतिशत का दान, जो उन लोगों को देना पड़्ता है, जो मालदार हों और उन लोगों को दिया जाता है, जो अपाहिज या असहाय और साधनहीन हों) को वसूल करने का आदेश दिया। 

  1. उलेमाओं के आदेश पर सुल्तान ने एक नया सिंचाई (हक ए शर्ब) कर भी लगाया, जो उपज का 1/10 भाग वसूला जाता था।
  2. फिरोजशाह  पहल शासक था ,जिसने इस्लाम धर्म को राज्य शासन का आधार बनाया। 
  3. फिरोजशाह तुगलक प्रथम शासक था जिसने ब्राह्मणो में जजिया कर लगाया। 
  4. जजिया को को खारिज से पृथक कर दिया। 
  5. ख़ुम्स नामक कर को शरीयत के अनुकूल बनाया ,जिसमे सैनिको का हिस्सा 4 /5 तथा राज्य का हिस्सा 1 /5 होना चाहिए। 
  6. फिरोजशाह तुगलक  प्रथम ऐसा शासक था ,जिसने मुस्लिम स्त्रियों द्वारा मुस्लिम संतो कि मजार पूजा पर पाबन्दी लगा दी। 

6. राज्य का ख़ाली खजाना :

फिरोज ने भूमि माप कि प्रणाली को छोड़कर खालसा भूमि से राजस्व वसूली हेतु मुकता प्रथा /इजारेदारी व्यवस्था  को अपनाया ,राज्य में आमदनी में वृद्धि हेतु फिरोजशाह तुगलक ने अंगूर के 1200 बाग लगवाए। 

लोककल्याणकारी कार्य :

1. दीवाने खैरात - गरीब मुसलमानो कि पुत्री के लिए धन देता था

2. रोजगार ब्यूरो - मुस्लिम बेरोजगारों के लिए

3. दिवाने-इश्तिहाक -  वृद्वस्था  पेंशन 

4. दीवाने बन्दगान - दासो को शिक्षा दी जाती थी

5. दीवाने ईमारत (लोक निर्माण विभाग )

6. दारुल-शफ़ा - एक राजकीय अस्पताल का निर्माण करवाया, जिसमें ग़रीबों का मुफ़्त इलाज होता था।

फिरोजशाह तुगलक के समय दासों की संख्या 1 लाख 80 हज़ार(सर्वाधिक) थी। 

नगरों की स्थापना :

  1. नगर एवं सार्वजनिक निर्माण कार्यों के अन्तर्गत सुल्तान ने लगभग 300 नये नगरों की स्थापना की।
  2.  इनमें से हिसार(हरियाणा), फ़िरोज़ाबाद (उत्तरप्रदेश), फ़तेहाबाद (हरियाणा का एक जिला), जौनपुर (उत्तरप्रदेश का एक शहर), फ़िरोज़पुर(पंजाब) आदि प्रमुख थे। 
  3. इन नगरों में यमुना नदी के किनारे बसाया गया फ़िरोज़ाबाद सुल्तान को सर्वाधिक प्रिय था। जौनपुर नगर की नींव फ़िरोज़ ने अपने चचेरे भाई 'फ़खरुद्दीन जौना' (मुहम्मद बिन तुग़लक़) की स्मृति में डाली थी।

उसके शासन काल में टोपरा  एवं मेरठ से अशोक के दो स्तम्भलेखों को लाकर दिल्ली में स्थापित किया गया। 

फ़िरोज़ की नीति एवं परिणाम :

फ़िरोज़ के शासनकाल में दासों की संख्या लगभग 1,80,000 पहुँच गई थी। इनकी देखभाल हेतु सुल्तान दे 'दीवान-ए-बंदग़ान' की स्थापना की। कुछ दास प्रांतों में भेजे गये तथा शेष को केन्द्र में रखा गया। 

दासों को नकद वेतन या भूखण्ड दिए गये। दासों को दस्तकारी का प्रशिक्षण भी दिया गया। सैन्य व्यवस्था के अन्तर्गत फ़िरोज़ ने सैनिकों पुनः जागीर के रूप में वेतन देना प्रारम्भ कर दिया। 

उसने सैन्य पदों को वंशानुगत बना दिया, इसमें सैनिकों की योग्यता की जाँच पर असर पड़ा। खुम्स का 4/5 भाग फिर से सैनिकों को देने के आदेश दिए गये। कुछ समय बाद उसका भयानक परिणम सामने आया। 

संरक्षण एवं रचनाएँ :

शिक्षा प्रसार के क्षेत्र में सुल्तान फ़िरोज़ ने अनेक मक़बरों एवं मदरसों (लगभग 13) की स्थापना करवायी। उसने 'जियाउद्दीन बरनी' एवं 'शम्स-ए-सिराज अफीफ' को अपना संरक्षण फ़िरोज़शाही’ की रचना की जबकि ‘सीरत-ए-फ़िरोज़शही’ की रचना किसी अज्ञात विद्धान द्वारा की गई है। 

फ़िरोज़ ने ज्वालामुखी मंदिर के पुस्तकालय से लूटे गये 1300 ग्रंथों में से कुछ का एजुद्दीन द्वारा ‘दलाल -ए -फ़िरोज़शाही’ नाम से अनुवाद करवाया। 'दलाल -ए -फ़िरोज़शाही' आयुर्वेद से संबंधित ग्रन्थ था। उसने जल घड़ी का अविष्कार किया।

फिरोज काल में खान-ऐ-जहाँ तेलगानी के मकबरा की तुलना जेरूसलम में निर्मित उमर के मस्ज़िद से की जाती है। सुल्तान फ़िरोज़ तुगलक ने दिल्ली में कोटला फिरोज शाह दुर्ग का निर्माण करवाया। अपने भाई जौना ख़ाँ (मुहम्मद तुग़लक़) की स्मृति में जौनपुर नामक शहर बसाया।

सिक्कों का प्रचलन :

फ़िरोज़ तुग़लक़ ने मुद्रा व्यवस्था के अन्तर्गत बड़ी संख्या में तांबा एवं चाँदी के मिश्रण से निर्मित सिक्के जारी करवाये, जिसे सम्भवतः ‘अद्धा’ एवं ‘मिस्र’ कहा जाता था। 

फ़िरोज़ तुग़लक़ ने ‘शंशगानी’ (6 जीतल का) का नया सिक्का चलवाया था। उसने सिक्कों पर अपने नाम के साथ अपने पुत्र अथवा उत्तराधिकारी 'फ़तह ख़ाँ' का नाम अंकित करवाया। 

फ़िरोज़ ने अपने को ख़लीफ़ा का नाइब पुकारा तथा सिक्कों पर ख़लीफ़ा का नाम अंकित करवाया। फ़िरोज़शाह तुग़लक़ का शासन कल्याणकारी निरंकुशता पर आधारित था। वह प्रथम सुल्तान था, जिसनें विजयों तथा युद्धों की तुलना में अपनी प्रजा की भौतिक उन्नति को श्रेष्ठ स्थान दिया, शासक के कर्तव्यों का विस्तृत किया तथा इस्लाम धर्म को राज्य शासन का आधार बनाया। 

हेनरी इलिएट और एलफिन्सटन ने फ़िरोज़ तुग़लक़ को “सल्तनत युग का अकबर” कहा है। फ़िरोज़शाह तुग़लक़ की सफलताओं का श्रेय उसके प्रधानमंत्री 'ख़ान-ए-जहाँ मकबूल' का दिया जाता है।

मृत्यु :

सुल्तान फ़िरोज़ शाह तुग़लक़ की मृत्यु सितम्बर 1388 ई॰ में हुई थी। हौज़खास परिसर,दिल्ली में उसे दफ़ना दिया गया।

मोहम्मद खान:1388 ई.

कुछ दिनों तक दिल्ली में शासन किया  जिसके बाद उसकी हत्या हो गई

गयासुद्दीन तुगलग शाह द्वितीय : 1388 ई.

फिरोज का पोता राजगद्दी पर बैठा परन्तु कुछ दिनों बाद ही उसकी हत्या हो गयी 

अबू बाकर:1389 -1390 ई.

गयासुद्दीन तुगलग शाह द्वितीय कि हत्या कर सुल्तान बन बैठा 

नसीरुद्दीन मोहम्मद शाह :1390 -1394 ई.

हुमायु :1394 - 1395 ई.

नसीरुद्दीन महमूद  शाह :1394 - 1412 ई.

दिल्ली के तुग़लक़ वंश का अंतिम सुल्तान था। उसके राज्यकाल में अनवरत संघर्ष चलते रहे और दुरावस्था अपनी चरम सीमा पर पहुँच गयी। महमूद तुग़लक़ के समय तक दिल्ली सल्तनत से दक्षिण भारत, बंगाल, ख़ानदेश, गुजरात, मालवा, राजस्थान, बुन्देलखण्ड आदि प्रान्त स्वतन्त्र गये थे। 

महमूद तुग़लक़ के समय में मलिक सरवर नाम के एक हिजड़े ने सुल्तान से ‘मलिक-उस-र्शक’ (पूर्वाधिपति) की उपाधि ग्रहण कर जौनपुर में स्वतन्त्र राज्य की स्थापना की। 

महमूद तुग़लक़ का शासन इस समय दिल्ली से पालम (निकटवर्ती कुछ ज़िलों) तक ही सीमित रह गया था। इस समय नुसरत शाह  तुग़लक़ एवं महमूद तुग़लक़ ने एक साथ शासन किया। महमूद तुग़लक़ ने दिल्ली से तथा नुसरत शाह ने फिरोजाबाद से अपने शासन का संचालन किया। महमूद तुग़लक़ के समय में तैमूर लंग ने 1398 ई. में दिल्ली पर आक्रमण किया। एक पैर से लंगड़ा होने के कारण उसका नाम ‘तैमूर लंग’ पड़ गया था। 

तैमूर के आक्रमण से डरकर दोनों सुल्तान राजधानी से भाग गये। 15 दिन तक दिल्ली में रहने के पश्चात् तैमूर वापस चला गया और ख़िज़्र ख़ाँ को अपने विजित प्रदेशों का राज्यपाल नियुक्त किया। एक मान्यता के अनुसार तैमूर आक्रमण के बाद दिल्ली सल्तनत का विस्तार सिमट कर पालम तक ही रह गया था। 

तैमूर के वापस जाने के पश्चात् महमूद तुग़लक़ ने अपने वजीर मल्लू इकबाल  की सहायता से पुन: दिल्ली सिंहासन पर अधिकार कर लिया, पर कालान्तर में मल्लू इकबाल मुल्तान के सूबेदार ख़िज़्र ख़ाँ से युद्ध करते हुए मारा गया। मल्लू इकबाल के मरने के बाद सुल्तान ने दिल्ली की सत्ता एक अफ़ग़ान सरदार दौलत ख़ाँ लोदी को सौंप दी। 1412 ई. में महमूद तुग़लक़ की मृत्यु हो गई। 

1413 ई. में दिल्ली सिंहासन के लिए दौलत ख़ाँ लोदी एवं ख़िज़्र ख़ाँ ने दिल्ली की गद्दी पर अधिकार कर एक नये राजवंश ‘सैय्यद वंश’ की स्थापना की।


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