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छत्तीसगढ़ का प्राचीन इतिहास : सिरपुर के पाण्डु वंश(Pandu vansh)

सिरपुर  के पाण्डु वंश

pandu vansh
लक्ष्मणेश्वर मंदिर 


इंद्रबल
ने शरभपुरी वंश को समाप्त कर छत्तीसगढ़ में पाण्डुवंश की स्थापना की.,पाण्डुवंश की छत्तीसगढ़ में चार शाखाएं थी। 

1 मैकल श्रेणी(सोमवंश)   2 कांकेर का सोमवंश  3 सिरपुर का पाण्डु वश 4 ओडिसा का सोम वंश 

मध्यभारत में दो पाण्डु वंशो ने शासन किया।  मैकल के पाण्डु वंश और सिरपुर के पाण्डुवंश। सिरपुर के पाण्डु वंश की संस्थापक  उदयन को माना जाता है जिसे इस वंश का आदिपुरुष भी कहा जाता है।  इस वंश का शासन 6 ई. से 7 वी ई. तक रहा।  इनकी राजधानी महानदी के तट पर स्थित शहर श्रीपुर थी, जो वर्तमान में सिरपुर के नाम से जानी जाती है।

सिरपुर के पाण्डुवंश 

  1. राजधानी - सिरपुर 
  2. संस्थापक व आदिपुरुष  - उदयन(कालिंजर शिलालेख में उल्लेख)
  3. वास्तविक संस्थापकइंद्रबल
  4. महाशिवगुप्त बालार्जुन के शासनकाल को छत्तीसगढ़ का स्वर्णकाल कहा जाता है।
  5. महाशिव तीवरदेव के शासनकाल को छत्तीसगढ़ का उत्कर्ष का काल कहा जाता है ।
  6. पाण्डुवंश को छत्तीसगढ़ में मंदिरो के निर्माण का काल कहा जाता है।
  7. उपाधि - परमभागवत 

 सिरपुर के पाण्डुवंश के प्रमुख शासक 

1.  उदयन :-

  1. कालिंजर शिलालेख के अनुसार इस वंश के संस्थापक उदयन को माना जाता है। इन्हे इस वंश का आदि पुरुष  कहा गया है। परन्तु  इनके शासन  का कोई उल्लेख नहीं मिलता है।

2.  इंद्रबल :-

  1. छत्तीसगढ़ में पाण्डुवंश के वास्तविक संस्थापक थे।
  2. इन्द्रबल के बारे में जानकारी उनके बेटे और उत्तराधिकारी ईशानदेव  के  एक शिलालेख से मिलती है। इंद्रबल शरभपुरीय शासक सुदेवराज का सामन्त था। 
  3. शरभपुरी वंश के अंतिम शासक प्रवरराज द्वितीय के हत्या कर सिरपुर में पाण्डु वंश की स्थापना की। इन्होने इन्द्रपुर नामक नगर बसाया जिसक वर्तमान में नाम खरौद है, साथ ही ,खरौद के लक्ष्मणेश्वर मंदिर का निर्माण करवाया।
  4. इन्द्रबल के 04 पुत्र  थे 1  नन्नराज प्रथम 2 सुरबल 3 ईशानदेव 4  भवदेव 

3.  ईशानदेव :- 

  1. यह इन्द्रबल के पुत्र और उत्तराधिकारी थे। खरौद के लक्ष्मणेश्वर मंदिर में इनके नाम का वर्णन मिलता है।
  2. 4 सुरबल :-
  3. इनकी जानकारी सिरपुर शिलालेख से मिलती है।

5.  भवदेव :-

  1. इनकी जानकारी भांदक शिलालेख से मिलती है। 

6. नन्नराज प्रथम :-

  1. इन्होने पाण्डुवंश का विस्तार किया।
  2. इन्होने अपने भाइयो को मण्डलाधिपति  के रूप में स्थापित किया।
  3.  इनके दो पुत्र महाशिव तीवरदेव और चन्द्रगुप्त थे।

7.  महाशिव तीवरदेव :-

  1. इस वंश के प्रतापी राजा थे।
  2. उपाधि - सकलाकोशलाधिपति 
  3. अनुयायी - वैष्णव धर्म 
  4. राजमुद्रा - गरुड़ 
  5. इन्होने अपनी पुत्री का विवाह नन्नराज द्वितीय से करवाया, सयोंग से पुत्र व दामाद का नाम नन्नराज था। दामाद को इन्होने पंचमहाशब्द की  उपाधि दी।

8.  नन्नराज द्वितीय :-

  1. उपाधि - कौशलमंडलाधिपति
  2. जानकारी - सेनकपाल अभिलेख 
  3. विस्तार - इन्होने अपने साम्राज्य का विस्तार महाराष्ट्र की ओर किया।

9.  चन्द्रगुप्त :-

  1. नन्नराज द्वितीय संतानहीन होने के कारण उनकी मृत्यु के बाद सत्ता की बागडोर उनके चाचा चन्द्रगुप्त ने संभाली।

10.  हर्षगुप्त :-

  1. हर्षगुप्त का विवाह मगध के मौखरी वंश के राजा सूर्यवर्मा की पुत्री रानी वसाटा से हुआ था।
  2. हर्षगुप्त की मृत्यु के बाद रानी वसाटा ने अपने पति की स्मृति में प्रसिद्ध लक्ष्मण मंदिर का निर्माण सिरपुर में करवाया। यह लाल ईटो से निर्मित गुप्तकालीन श्रेष्ठ नमूना है।
  3. प्रसिद्ध  लक्ष्मण मंदिर विष्णु भगवान का मंदिर है।

11.  महाशिवगुप्त बालार्जुन (595 -655 ई.) :-

  1. महाशिवगुप्त बालार्जुन का  शासनकाल  छत्तीसगढ़ के इतिहास का स्वर्णकाल कहलाता है।
  2. पाण्डुवंशीय शासको में सर्वाधिक शासन इन्ही का था।
  3. अनुयायी - शैव धर्म 
  4. उपाधि - परम महेश्वर 
  5. समकालीन वंश - हर्षवर्धन(पुष्यभूति वंश) पुलकेशिन द्वितीय(बादामी के चालुक्यी वंश )
  6. ताम्रपत्र/शिलालेख - 27 (छत्तीसगढ़ में सर्वाधिक शिलालेख इन्ही के मिलते है), इन ताम्रपत्रों की खोज विष्णु ठाकुर व रमेन्द्रनाथ मिश्र ने की थी।
  7. प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेनसांग ने इनके शासनकाल में 639 ई. में सिरपुर व मल्हार की यात्रा की थी।
  8. ऐहोल प्रशस्ति(पुलकेशिन द्वितीय) के अनुसार महाशिवगुप्त बालार्जुन ने पुलकेशिन द्वितीय की अधीनता स्वीकार की थी।

 पाण्डु वंशीय स्थापत्य कला 

लक्ष्मण मंदिर(सिरपुर ) :-

  1. भगवान विष्णु  का मंदिर है। 
  2. निर्माणका प्रारंभ -  वसाटा देवी द्वारा 
  3. पूर्ण - महाशिवगुप्त बालार्जुन

लक्ष्मणेश्वर(खरौद) :- 

  1. निर्माण - इन्द्रबल 
  2. भगवान शिव का मंदिर है।
  3. 1 .25 लाख चावल एवं छिद्र के लिए प्रसिद्ध।

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