अलाउद्दीन खिलजी द्वारा करवाए गए प्रमुख सुधार
अलाउद्दीन खिलजी का राजत्व सिद्धांत
- अलाउद्दीन खिलजी का राजत्व सिद्धांत को अमीर खुसरो ने प्रतिपादित किया।
- अलाउद्दीन दिल्ली का प्रथम सुल्तान था ,स्पष्ट शब्दों में घोषणा की थी कि राजत्व ,रक्त संबंध नहीं जानता है।
- उसने प्रशासन में नस्लवादी नीति को छोड़ दिया। अलाउद्दीन ने बलबन की जातीय उच्चतावादी नीति को त्याग दिया और योग्यता के आधार पर पदों का वितरण किया।
- अमीर वर्ग में भारतीय मुसलमानों और गैर तुर्की मुसलमानों को शामिल किया।
- अलाउद्दीन ने अपने शासन में उलेमा वर्ग से राजनीति के संबंध में सलाह नहीं ली।
- अलाउद्दीन ने रजनीति को धर्म से अलग रखा।
अलाउद्दीन ने यामिनी-उल-खलीफा और नासिरी-अमीर-मुमनीन(खलीफा का नायब) कि उपाधि ग्रहण की, लेकिन सुल्तान से कभी सुल्तान पद की अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं समझी।
बयाना के काजी मुगीसुद्दीन से अलाउद्दीन ने कहा था कि "में अपनी प्रजा को ऐसे आदेश देता हू ,जिन्हे राज्य के लिए लाभदायक और परिस्थितियों के अनुकूल समझता हू। मैं नहीं जानता कि शरा इसकी इजाजत देता है या नहीं। मैं यह बी नहीं जानता कि अंतिम निर्णय के समय खुदा मेरे साथ क्या व्यवहार करेगा।
भू -राजस्व सुधार :
अलाउद्दीन खिलजी ने सशक्त सेना के निर्माण और अमीर वर्ग में धन सकेंद्रण को रोकने हेतु भू राजस्व सुधार करवाए।
प्रथम चरण :
- अलाउद्दीन ने सभी भूमि अनुदानों जैसे मिल्क ,इनाम ,वक्क आदि को वापस लेकर उसे खालीसा भूमि में बदल दिया खालीसा भूमि प्रत्यक्ष रूप राज्य के नियंत्रण में होती थी।
- सल्तनत काल में सबसे अधिक खालीसा भूमि अलाउद्दीन खिलजी के समय थी।
दूसरा चरण :
- अलाउद्दीन ने दोआब क्षेत्र में भूमि कि पैमाइश(माप ) करवाई। भूमि का माप करवाने वाला वह पहला मुस्लिम शासक था।
- अलाउद्दीन कि भूमि पैमाइश प्रणाली को वफ़ा-ए-बिस्वा कहा जाता है। जहां वफ़ा का अर्थ उपज और बिस्वा का अर्थ बीघे के 20 वें भाग से है।
ग्रामीण क्षेत्रों की भूमि की माप और मध्यस्थ वर्ग का अंत :
- अलाउद्दीन ने ग्रामीण क्षेत्रों के मध्य वर्ग चौधरी ,मुकद्दम ,खुत की भूमि की माप करवाई। उन पर भी राजस्व को निश्चित किया।
- अलाउद्दीन ने कर वसूलने वाले अधिकार हकूक -ए-खोती( कर वसूलने के बदले उपज का 10 %) और किस्मत-ए-खोती(किसानो से अतरिक्त लिया जाने वाला कर ) पर पाबन्दी लगा दी। इस प्रकार अलाउद्दीन ने मध्यस्थ वर्ग का अंत कर दिया।
- भूमि माप की प्रणाली को दिल्ली और दोआब क्षेत्र में लागू की गयी थी न की सम्पूर्ण साम्राज्य में।
राजस्व व्यवस्था :
- अलाउद्दीन खिलजी के समय भू-राजस्व की राशि कुल उत्पादन का 50 % थी।
- कृषको पर घरी(गृह कर ) और चरी(चरागाह कर ) लगाया था।
- भू-राजस्व को नकद के बदले अनाज में वसूलने की प्राथमिकता दी।
अलाउद्दीन ने दीवान-ए-मुस्तखराज नामक नवीन विभाग की स्थापना की। मुस्तखराज इस विभाग का प्रमुख था ,जिसका कार्य राजस्व एकत्र करने वाले अधिकारियो के नाम की बकाया राशि की जाँच करने और वसूल करने का काम सौपा गया था।
सैन्य प्रशासन व सुधार :
1. दीवान-ए-वजारत: इसका प्रमुख वजीर होता था। इसका मुख्य विभाग वित्त विभाग था। वजीर राजस्व के एकत्रीकरण और प्रांतीय सरकारों के दीवानी पक्ष के प्रशासन में सुल्तान के प्रति उत्तरदायी था।
2. दीवान-ए-आरिज: यह सैन्य मंत्री होता था। सेना की भर्ती, वेतना बांटना, सेना का हुलिया एवं सैनिकों की नामावली की जानकारी रखता था।
3. दीवान-ए-इंशा: इसका कार्य शाही आदेशों एंव पत्रों का प्रारूप तैयार करना तथा स्थानीय अधिकारियों से पत्र व्यवहार करना।
4. दीवान-ए-रसालत: पड़ोसी राज्यों में भेजे जाने वाले पत्रों का प्रारूप तैयार करना एवं विदेशी राजदूतों से संपर्क रखना।
5. दीवान-ए-रियासत: अलाउद्दीन ने यह नया मंत्रालय स्थापित किया था। इसका कार्य राजधानी के आर्थिक मामलों की देखभाल करना था। व्यापारी वर्ग पर नियंत्रण रखता था।
अलाउद्दीन प्रथम सुल्तान था ,जिसने केंद्र में स्थायी सेना रखी और सैनिको को नगद वेतन दिया
- अलाउद्दीन ने दाग तथा हुलिया पद्धति को भी लागू किया ताकि कोई भी सैनिक दोबारा निरीक्षण के लिए एक ही घोड़े को न ले जाये।
- अलाउद्दीन ने खम्स(लूट के माल) का 4 /5 भाग राज्य के लिए रखा तथा 1 /5 भाग सैनिको को दिया।
बाजार नियंत्रण व्यवस्था :
उद्देश्य :
- मंगोल आक्रमण से राज्य की सुरक्षा करने के लिए।
- विशाल सेना का निर्माण करने के लिए ।
- सैनिको की आवश्यकता को ध्यान में रखना ।
इन तीनो चीजों को ध्यान में रखकर अलाउद्दीन ने बाजार प्रणाली लागू की ,हालांकि इसका लाभ सामान्य जानता को भी हुआ। यह व्यवस्था सैनिको के बैरकों के आसपास ,दिल्ली और बदायूं द्धार पर लागू की गयी थी।
अलाउद्दीन ने बाजार व्यवस्था को सही तरीके से चलाने के लिए दीवान-ए-रियासत विभाग की स्थापना की। इस विभाग का प्रमुख मालिक याकूब को बनाया गया। नज़ीर के विभाग(नाप-तौल) तथा मुहतसिब के विभाग को दीवान-ए-रियासत विभाग के अंतर्गत रखा गया।
बाजार नियंत्रण के लिए 03 प्रकार के बाजार स्थापित किये गए :
- अनाजों की मंडी
- वस्त्र बाजार
- दास-दासियो और घोड़े -मवेशियों के बाजार
अनाजों की मंडी :
1. शहना-ए-मंडी -यह एक सरकारी कार्यालय था जिसमे पंजीकृत व्यापारियों को ही किसानो से अनाज खरीदने और उसे फिर मंडी में बेचने का अधिकार था। अलाउद्दीन खिलजी के समय इस विभाग का प्रमुख अधिकारी मालिक काबुल था।
2. इस मंडी में सभी प्रकार अनाज बेचे जाते थे।
3. मूल्यों की स्थिरता अलाउद्दीन की सबसे बड़ी सफलता थी। राजकीय नियंत्रण इतना कठोर था कि कम तोलने वाले के शरीर से उतना ही मांस काट लिया जाता था।
वस्त्र बाजार (सराय-ए-अदल) :
1. सराय-ए-अदल में कपड़ो कि बिक्री को निश्चित करने तथा कालाबाज़ारी को को रोकने के लिए यह विभाग बनाया गया था। जिसका मुख्य अधिकारी राय परवाना होता था।
2. इस बाजार में कपड़ो को बेचने के लिए व्यपारियो को राजकीय सहायता भी दी जाती थी।
3. इस बाजार में वस्त्रो के अलावा तेल ,घी,सूखे मेवे,जड़ी -बूटी आदि सरकारी डरो में बेचे जाते थे।
दास-दासियो और घोड़े -मवेशियों के बाजार :
1. इस बाजार में सभी प्रकार के पक्षी ,पशु ,दास-दासी आदि को सरकारी दरों में बेचा जाता था। अलाउद्दीन ने दलालो को इस बाजार से दूर रखा व उनमें कठोर प्रतिबन्ध लगाया।
अलाउद्दीन बाजार व्यवस्था कि सूचना राजकीय अधिकारी ,बरीद(राजकीय गुप्तचर) तथा मुन्हीयान(व्यक्तिगत गुप्तचर ) से सूचना प्राप्त करता था।
निर्माण :
- कोशिक-ए-सिरी का किला
- अलाई दरवाज़ा - इसका निर्माण कुतुबमीनार परिसर में स्थित मस्जिद के सामने करवाया।
- हजारखंभ महल -यह एक प्रकार का तालाब था।
- होजे खास - यह एक प्रकार का तालाब था।
दरबारी कवि :
- अमीर खुसरो
- हसन दहलवी -यह उच्चकोटि के गजल रचयिता थे। उन्हें भारत का सादी कहा जाता है। उनकी रचना फ़वायद-उल-फवाद है।
अलाउद्दीन खिलजी की मृत्यु :
5 फरवरी 1316 ई. में अलाउद्दीन खिलजी कि मृत्यु हो गई।


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