दिल्ली सल्तनत : गुलाम वंश
रुकनुद्दीन फिरोजशाह : 1236 ई.
इल्तुमिश ने सुल्तान के पद को वंशानुगत बनाते हुए अपना उत्तराधिकारी अपनी पुत्री को चुना था, किन्तु तुर्की आमीरो ने उसके पुत्र रुकनुद्दीन को सुल्तान बनाया।
रुकनुद्दीन फिरोज के शासनकाल में लाहौर,बदायूं,मुल्तान तथा हांसी के इक्तादारो ने दिल्ली को घेर लिया तथा इल्तुमिश का वजीर निजामुलमुल्क भी उसमे मिल गया। जब रुकनुद्दीन उनका सामना करने के लिए राजधानी से बाहर निकला,तो रजिया इसकी अनुपस्थिति का फायदा उठाते हुए शुक्रवारी नमाज के दिन वह लाल वस्त्र पहुंचकर जामा मस्जिद में गयी.रजिया ने वह जाकर लोगो को इल्तुमिश की इच्छाओ से अवगत करवाय।
उस समय लाल रंग न्याय का प्रतीक था। दिल्लीवासियों पर रजिया की प्रत्यक्ष अपील का गहरा प्रभाव पड़ा और दिल्ली में एक विद्रोह की स्थिति उत्पन्न हो गई ,जिसमे फिरोज की हत्या कर दी गई तथा रजिया को सुल्तान बनाया गय। इस प्रकार रुकनुद्दीन क शासनकाल सात माह में समाप्त हो गय।
रजिया सुल्तान :1236-1240 ई.
रजिया के मामले में पहली बार दिल्ली की जनता ने उत्तराधिकारी के प्रश्न का स्वयं निर्णय लिय। इस्लामिक जगत में रजिया से पहले ईरान तथा मिस्र में महिला शासिका थी ,परन्तु रजिया भारत की पहली मुस्लिम शासिका बनी।
- रजिया ने अपने सिक्को पर उम्दत-उल-निस्वां की उपाधि ली।
- रजिया ने पर्दा त्याग दिया एवं पुरूषों के समान कुवा(कोट) और कुलाह(टोपी) पहनकर दरबार में बैठती थी।
रजिया की सबसे बड़ी समस्या :
बदायुँ,मुल्तान,हांसी तथा लाहौर के गवर्नरों ने राजधानी को अपनी सेना के साथ घेर रखा था। तथा दिल्ली का वजीर निजामुलमुल्क जुनैदी भी उनसे मिला गया था। ये पांचो रजिया को सुल्तान मानने को तैयार नहीं थे। रजिया ने कूट नीति का सहारा लेते हुए अफवाह फैला दी की चारो गवर्नर रजिया से मिले हुए है।
परिणामस्वरूप चारो में आपसी अविश्वास उत्पन्न हो गया तथा उन्होंने ने राजधानी खाली कर दी। निजामुलमुल्क जुनैदी भी राजधानी छोड़ कर भाग गया।
रजिया ने महत्वपूर्ण पदों पर प्रमुख व्यक्तियों को रखा।
- जमालुद्दीन याकूत - अमीर-ए-आखूर(अश्वशाला का प्रधान)-अबीसिनियन
- अल्तूनिया - भटिण्डा(पंजाब) का सूबेदार(इक्तादार)
- बलवन - अमीर-ए-शिकार
इनमे से सर्वाधिक विवाद याकूत के पद को लेकर था।
रजिया का प्रशासन :
- जब रजिया ने आमिर वर्गों में गैर-तुर्की को शामिल करना प्रारंभ ,तब तुर्की अमीर चोक्कने हो गय। उनके द्वारा अफवाह फैलाई गई की रजिया का याकूत के साथ अवैध संबंध है। परिणाम स्वरुप रजिया के विरुद्ध चारो तरफ विद्रोह होने लगे। इन सबके पीछे ऐतगीन का हाथ था।
- लाहौर के सूबेदार कबीर खां तथा बठिण्डा के सूबेदार अल्तूनिया ने 1240ई. में विद्रोह कर दिया। उसे दबाने के लिए रजिया पंजाब की तरफ निकली किन्तु अल्तुनिया द्वारा मार्ग रोक कर युद्ध किया गया जिसमें याकूत मारा गया तथा रजिया को भटिण्डा के किले में बंद कर दिया गया।
- दिल्ली के वज़ीर ऐतगीन ने इल्तुमिश के तीसरे बेटे बहरामशाह को शासक बना दिया। लेकिन अल्तुनिया को उसकी इच्छानुसार पद नहीं मिलने पर उसने रजिया से विवाह कर लिया और दिल्ली की ओर प्रस्थान किया किन्तु मार्ग में कैथल(पंजाब) में डाकुओं के द्वारा 1240 ई. में अल्तूनिया तथा रजिया की हत्या कर दी गई।
रजिया के शासन में ‘इक्तादारों’, ‘चहल-गानी’, ‘अमीर तुर्को’ ने विद्रोह किया जिससे शासन में करने में अनेक कठिनाइयां आयी।
रजिया के पतन के कारण :
- तुर्क अमीरो की ईर्ष्या।
- रजिया का स्त्री होना।
मिनहाज ने रजिया के गुणों की प्रशंसा की है और लिखा है कि ,“सुल्तान रजिया एक महान् शासक थी - बुद्धिमान, न्यायप्रिय, उदारचित्त और प्रजा की शुभचिन्तक, समदृष्टा, प्रजापालक और अपनी सेनाओं की नेता, उसमें बादशाही के समस्त गुण विद्यमान थे - सिवाय नारीत्व के और इसी कारण मर्दो की दृष्टि में उसके सब गुण बेकार थे।”
मुइनुद्दीन बहराम शाह : 1240-1242 ई.
रजिया के बाद मुइनुद्दीन बहराम शाह सुल्तान बना। इसके शासनकाल में सुल्तान की शक्ति एवं अधिकारिता को कम करने के लिए तुर्की अमीरों ने ‘नायब -ए- ममलिकत ’(पहली बार ) के पद की रचना की।
- नायब -ए- ममलिकत - यह पद संरक्षक के समान था जिसके पास सुल्तान के समान शक्ति एवं पूर्ण अधिकार थे।
- प्रथम नायब-ए-मुमलिकत - मलिक इख्तियारूद्दीन ऐतगीन।
वास्तविक शक्ति एवं सत्ता के अब 3 दावेदार थे - सुल्तान, वजीर और नायब।
इसके शासन काल में 1241 ई. में तैर बहादुर के नेतृत्व में मंगोल का आक्रमण हुआ। यह आक्रमण मंगोलों द्वारा किया।
वजीर मुहज्जबुद्दीन ने अमीर तुर्कों को सुल्तान के खिलाफ भडका दिया तथा अपनी प्रतिष्ठा और विशेषाधिकारों के संबंध में तुर्क सरदारों से समझौता नहीं किया। जिसके कारण तुर्की अमीरो ने 1242ई. में बहराम शाह को कैद कर उसकी हत्या कर दी गई।
उसके स्थान पर फिरोजशाह के पुत्र अलाउद्दीन मसूदशाह को सुल्तान बनाया गया।
अलाउद्दीन मसूदशाह : 1242 -1246 ई
- अमीरों ने अलाउद्दीन मसूद शाह को सुल्तान चुना। मसूदशाह इल्तुतमिश के पुत्र रूकन्नुद्दीन फिरोजशाह का पुत्र था।
- अलाउद्दीन मसूदशाह का अमीर-ए-हाजिब(विशेष सचिव), बलबन था।
- मलिक कुतुबुद्दीन हसन को नायब बनाया गया।
- गयासुद्दीन बलबन - यह ‘चहलगानी’ का सदस्य था। इसने बहराम शाह के विरूद्ध विद्रोह में सबसे अधिक साहस दिखाया था। 1249ई. में इसे उलुग खां की उपाधि दी गयी थी।
बलवन और मसूदशाह के बीच मतभेद होने पर बलबन ने 1246ई. में नासिरूद्दीन को पद पर बैठाने के लिए षड़यंत्र रचा एवं सुल्तान को कैद कर लिया। कैद में ही उसकी मृत्यु हो गयी।
नासिरूद्दीन महमूद : 1242 -1246 ई.
नासिरुद्दीन के कल में कुछ समय को छोड़कर शासन सत्ता बलबन के हाथो में रही। शुरुआत में बलबन अमीरे-हाज़िब के पद पर था ,परन्तु जब उसने अपनी पुत्री का विवाह नासिरुद्दीन से कर दिया ,तो सुल्तान ने उसे नायब-ए-ममलिकत का पद तथा उलुग खां की उपाधि दी।
माना जाता हे की कुछ भारतीय मुसलमान तथा गैर तुर्की आमीरो ने षड्यंत्र करके सुल्तान को पद से हटवा दिया। इस षड़यंत्र का प्रायोजक किचलू खां तथा रिहान (वकील-ऐ-दर) था। बलबन को हटाकर उसकी जगह रिहान नामक भारतीय मुसलमान को नायब-ऐ-ममलिकत के पद पर नियुक्त किया गया। भारतीय मुसलमान के सर्वोच्च पद प्राप्त करने पर तुर्की अमीरो ने तुरंत प्रतिक्रिया दिखाई तथा सुल्तान को पुनः अपना आदेश वापस लेना पड़ा।
बलबन को पुनः नायब-ए-ममलिकत का पद वापस कर दिया गया। रिहान की किसी ने हत्या करवा दी।
नासिरुद्दीन महमूद धर्मपरायण व सादगी पसंद व्यक्ति था,उसे हस्तलिपि का शौक था। वह कुरान की नक़ल कर उसे बेच कर आय प्राप्त करता था। तबकात-ए-नासिरी , महमूद के शासनकाल में मुख्य काजी के पद पर था ,जो षड़यंत्र का द्वारा उसी के शासनकाल में हटा दिया गया। मिनहाज़-उस-सिराज ने अपनी तबकात-ए-नासिरी उसे समर्पित की।
मिनहाज़ ने नासिरूद्दीन महमूद को दिल्ली का आदर्श सुल्तान कहा है।
- 1266ई. में अचानक मृत्यु हो गयी। इसका कोई पुत्र नहीं था। यह शम्शी राजवंश का अंतिम शासक था।
- नासिरूद्दीन महमूद की मृत्यु के बाद गयासुद्दीन बलबन शासक बना। बलबन ने बलवनी वंश की स्थापना की।


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