तुगलग वंश :1320-1414 ई.
मोहम्मद बिन तुगलग : 1324 -1351 ई.
- मुहम्मद बिन तुग़लक़ दिल्ली सल्तनत में तुग़लक़ वंश का शासक था। ग़यासुद्दीन तुग़लक़ की मृत्यु के बाद उसका पुत्र 'जूना ख़ाँ', मुहम्मद बिन तुग़लक़ के नाम से दिल्ली की गद्दी पर बैठा। इसका मूल नाम 'उलूग ख़ाँ' था।
- इसका मूल नाम जूना खां(जौना खां) था इसे उलूग खां की उपाधि दी गयी थी।
- राजमुंदरी के एक अभिलेख में मुहम्मद तुग़लक़ (जौना या जूना ख़ाँ) को दुनिया का ख़ान कहा गया है। सम्भवतः मध्यकालीन सभी सुल्तानों में मुहम्मद तुग़लक़ सर्वाधिक शिक्षित, विद्वान एवं योग्य व्यक्ति था।
- अपनी सनक भरी योजनाओं, क्रूर-कृत्यों एवं दूसरे के सुख-दुख के प्रति उपेक्षा का भाव रखने के कारण इसे 'स्वप्नशील', 'पागल' एवं 'रक्त-पिपासु' कहा गया है। इसे इतिहास में एक बुद्धिमान मूर्ख शासक के रूप में जाना जाता है।
- बरनी, सरहिन्दी, निज़ामुद्दीन, बदायूंनी एवं फ़रिश्ता जैसे इतिहासकारों ने सुल्तान को अधर्मी घोषित किया गया है।
- मोहम्मद बिन तुगलक के काल की जानकारी इसामी,इब्नबतूता ,बरनी एवं अलउमरी की रचनाओं से प्राप्त होती है। मोहम्मद बिन तुगलक ने कई प्रशासनिक प्रयोग किये।
वरनी के अनुसार : मोहम्मद बिन तुगलक ने 5 प्रशासनिक प्रयोग किये :
- दोआब क्षेत्र में कर वृद्धि
- राजधानी परिवर्तन
- सांकेतिक मुद्रा का प्रचलन
- खुरासान अभियान
- कराचिल अभियान
1. दोआब क्षेत्र में कर वृद्धि :
अपनी प्रथम योजना के द्वारा मुहम्मद तुग़लक़ ने दोआब के ऊपजाऊ प्रदेश में कर की वृद्धि कर दी (संभवतः 50 प्रतिशत), परन्तु उसी वर्ष दोआब में भयंकर अकाल पड़ गया, जिससे पैदावार प्रभावित हुई।
तुग़लक़ के अधिकारियों द्वारा जबरदस्ती कर वसूलने से उस क्षेत्र में विद्रोह हो गया, जिसका सुल्तान ने कठोरतापूर्वक दमन किया ,हालांकि बाद में सुल्तान ने किसानों को कई सुविधाएं दी। फिर भी तुग़लक़ की यह योजना असफल रही।
मुहम्मद बिन तुग़लक़ ने कृषि के विकास के लिए ‘दीवान-ए- कोही’ नामक एक नवीन विभाग की स्थापना की। जिसके लिए मंत्री अमीर-ए-कोही को नियुक्त किया।
दीवान-ए- कोही का उद्देश्य :
- किसानों को आर्थिक सहायता(तकावी एवं सोनधर) देकर कृषि योग्य भूमि का विस्तार करना था। मुहम्मद बिन तुग़लक़ ने सर्वप्रथम कृषि भूमि के आकलन के लिए रजिस्टर तैयार करवाया।
- मुहम्मद बिन तुग़लक़ ने कृषको को बीज ,बैल आदि दिए व सिंचाई के लिए नहर खुदवाये। यहां तक की उसने अकालग्रस्त लोगो की सहायता के लिए अकाल संहिता भी तैयार करवाई।
- मुहम्मद बिन तुग़लक़ प्रथम मुस्लिम शासक था ,जिसने कृषि उत्पादन में वृद्धि हेतु सश्यावर्तन प्रणाली अपनाई। साथ ही नकदी खेती को भी प्रोत्साहन दिया।
- इसके लिए 70 ,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में नकदी फसल के उत्पादन को प्रोत्साहित किया।
निष्कर्ष :
सरकारी कर्मचारियों के भ्रष्टाचार, किसानों की उदासीनता, भूमि का अच्छा न होना इत्यादि कारणों से कृषि उन्नति सम्बन्धी योजना असफल रही तथा तीन वर्ष पश्चात् यह योजना समाप्त कर दी गई ।
2. राजधानी परिवर्तन:1326-27
- मोहम्मद बिन तुगलक ने अपनी दूसरी योजना के अन्तर्गत राजधानी दिल्ली से हटाकर दौलताबाद में स्थापित किया।सभवतः प्रशासनिक सुविधाओं और मंगोलो से सुरक्षा को ध्यान में रखकर ऐसा निर्णय लिया गया था।
- देवगिरि को “कुव्वतुल इस्लाम” भी कहा गया। सुल्तान कुतुबुद्दीन मुबारक ख़िलजी ने देवगिरि का नाम 'कुतुबाबाद' रखा था और मुहम्मद बिन तुग़लक़ ने इसका नाम बदलकर दौलताबाद कर दिया।
- विद्रोहों के कारण शीघ्र ही दक्षिणी क्षेत्र सल्तनत से बाहर हो गये और देवगिरी को राजधानी बनाए जाने का औचित्य समाप्त हो गया।
मुहम्मद तुग़लक़ की यह योजना भी पूर्णतः असफल रही और उसने 1335 ई. में दौलताबाद से लोगो इच्छा अनुसार दिल्ली वापस जाने का आदेश दिया गया। । राजधानी परिवर्तन के परिणामस्वरूप दक्षिण में मुस्लिम संस्कृति का विकास हुआ, जिसने अंततः बहमनी साम्राज्य के उदय का मार्ग खोला।
राजधानी परिवर्तन से लाभ :
- उत्तर व दक्षिण भारत की संस्कृतिया एक दूसरे से परिचित हुई। इस प्रकार उत्तर भारत की संस्कृति का दक्षिण भारत में प्रसार हुआ।
- 1335 ई. में दिल्ली पुनः राजधानी बनी।
3. सांकेतिक मुद्रा का प्रचलन
- तीसरी योजना के अन्तर्गत मुहम्मद तुग़लक़ ने सांकेतिक व प्रतीकात्मक सिक्कों का प्रचलन करवाया।
- सिक्के संबंधी विविध प्रयोगों के कारण ही एडवर्ड टामस ने उसे ‘धनवानों का राजकुमार’ कहा है।
- मुहम्मद तुग़लक़ ने 'दोकानी' नामक सिक्के का प्रचलन करवाया। बरनी के अनुसार सम्भवतः सुल्तान ने राजकोष की रिक्तता के कारण एवं अपनी साम्राज्य विस्तार की नीति को सफल बनाने हेतु सांकेतिक मुद्रा का प्रचलन करवाया।
- सांकेतिक मुद्रा के अन्तर्गत सुल्तान ने संभवतः पीतल (फ़रिश्ता के अनुसार) और तांबा (बरनी के अनुसार) धातुओं के सिक्के चलाये, जिसका मूल्य चांदी के रुपये टका के बराबर होता था।
- सिक्का ढालने पर राज्य का नियंत्रण नहीं रहने से अनेक जाली टकसाल बन गये। लगान जाली सिक्के से दिया जाने लगा, जिससे अर्थव्यवसथा ठप्प हो गई।
सांकेतिक मुद्रा चलाने की प्रेरणा चीन तथा ईरान से मिली। वहाँ के शासकों ने इन योजनाओं को सफलतापूर्वक चलाया, जबकि मुहम्मद तुग़लक़ का प्रयोग विफल रहा। सुल्तान को अपनी इस योजना की असफलता पर भयानक आर्थिक क्षति का सामना करना पड़ा।
निष्कर्ष :
इस व्यवस्था की विफलता देखते हूए सुल्तान ने 3 -4 वर्षो के बाद सभी सांकेतिक मुद्राओ को वापस ले लिया तथा उसके बदले सोने व चांदी के सिक्के वापस कर दिए।
साम्राज्य विस्तार :
4. खुरासान अभियान :
चौथी योजना के अन्तर्गत मुहम्मद तुग़लक़ के खुरासान एवं कराचिल विजय अभियान का उल्लेख किया जाता है।
खुरासान को जीतने के लिए मुहम्मद तुग़लक़ ने 3,70,000 सैनिकों की विशाल सेना को एक वर्ष का अग्रिम वेतन दे दिया, परन्तु राजनीतिक परिवर्तन के कारण दोनों देशों के मध्य समझौता हो गया, जिससे सुल्तान की यह योजना असफल रही और उसे आर्थिक रूप से हानि उठानी पड़ी।
5. कराचिल अभियान :
कराचिल अभियान के अन्तर्गत सुल्तान ने खुसरो मलिक के नेतृत्व में एक विशाल सेना को पहाड़ी राज्यों को जीतने के लिए भेजा। जिसमे खुसरो मलिक को सफलता प्राप्त हुईं तथा यह के शासक ने अधीनता स्वीकार कर ली। परन्तु खुसरो मलिक की सेना कराचिल से आगे तिब्बत की और बढ़ गए।
उसकी पूरी सेना जंगली रास्तों में भटक गई, जहां बख्तियार खिलजी की तरह भी उसकी सेना नष्ट हो गई। इब्नबतूता के अनुसार केवल दस अधिकारी ही बचकर वापस आ सके। इस प्रकार मुहम्मद तुग़लक़ की यह योजना भी असफल रही।
मंगोल आक्रमण :
सल्तनत काल में अंतिम मंगोल आक्रमण मोहम्मद बिन तुगलक के समय तरमाशीरीन के नेतृत्व में हुआ।
सम्भवतः 1328-29 ई. के मध्य मंगोल आक्रमणकारी तरमाशीरीन चग़ताई ने एक विशाल सेना के साथ भारत पर आक्रमण कर मुल्तान, लाहौर से लेकर दिल्ली तक के प्रदेशों को रौंद डाला।
ऐसा माना जाता है कि, सुल्तान मुहम्मद तुग़लक़ ने मंगोल नेता को घूस देकर वापस कर दिया था, ये भी सभंव है कि मंगोल नेता ने सुल्तान को दिल्ली सल्तनत को खुद ही यथास्थिति कमज़ोर करने व इसी तरह मंगोल शासन के लिए जमीन त्याग करने के लिए घूस दी। उनके बीच जो भी हुआ, मंगोल नेता के प्रति इस समझोते की नीति के कारण सुल्तान को आलोचना का शिकार बनना पड़ा।
ये सही है कि इसके बाद फिर कभी मुहम्मद तुग़लक़ के समय में भारत पर मंगोल आक्रमण नहीं हुआ और ये भी कि अपनी महत्त्वाकांक्षी असफल योजनाओं के कारण मुहम्मद तुग़लक़ को ‘असफलताओं का बादशाह’ कहा जाता है।
महत्त्वपूर्ण विद्रोह :
मुहम्मद बिन तुग़लक़ के शासन काल में सबसे अधिक (34) विद्रोह हुए, जिनमें से 27 विद्रोह अकेले दक्षिण भारत में ही हुए।
सुल्तान मुहम्मद तुग़लक़ के शासन काल में हुए कुछ महत्त्वपूर्ण विद्रोहों का सारांश निम्नलिखित हैं-
- प्रथम विद्रोह 1327 ई. में तुग़लक़ के चचेरे भाई सुल्तान गुरशास्प ने किया, जो गुलबर्ग के निकट सागर का सूबेदार था। वह सुल्तान द्वारा बुरी तरह से पराजित किया गया।
- मुहम्मद तुग़लक़ के विरुद्ध सिंध तथा मुल्तान के सूबेदार बहराम आईबा ऊर्फ किश्लू ख़ाँ ने 1327-28 ई. में विद्रोह किया।
- सैयद जलालुद्दीन हसनशाह का मालाबार विद्रोह 1334-35 ई. में किया गया।
- बंगाल का विद्रोह (1330-1331 ई.) प्रमुख हैं।
- बंगाल के विद्रोह को यद्यपि प्रारंभ में दबा लिया गया था, किन्तु 1340-1341 ई. के लगभग शम्सुद्दीन के नेतृत्व में बंगाल दिल्ली सल्तनत से अलग हो गया।
- 1337-38 ई. में कड़ा के सूबेदार निज़ाम भाई का विद्रोह
- 1338-39 ई. में बीदर के सूबेदार, नुसरत ख़ाँ का विद्रोह,
- 1339-40 ई. में गुलबर्ग के अलीशाह का विद्रोह आदि भी मुहम्मद तुग़लक़ के विरुद्ध किये गये विद्रोहों में प्रमुख हैं।
इस तरह के विद्रोहों का सुल्तान ने सफलतापूर्वक दमन किया।
मुहम्मद तुग़लक़ के शासनकाल में ही दक्षिण में 1336 ई. में 'हरिहर' एवं 'बुक्का' नामक दो भाईयों ने स्वतंत्र ‘विजयनगर’ की स्थापना की।
अफ़्रीकी यात्री इब्नबतूता को 1333 ई. में मुहम्मद ने अपने राजदूत के रूप में चीन भेजा। इब्नबतूता ने अपनी पुस्तक ‘रेहला’ में मुहम्मद तुग़लक़ के समय की घटनाओं का वर्णन किया है।
मुहम्मद तुग़लक़ धार्मिक रूप में सहिष्णु था। जैन विद्वान एवं संत 'जिनप्रभु सूरी' को दरबार में बुलाकर सम्मान प्रदान किया।
मुहम्मद बिन तुग़लक़ दिल्ली सल्तनत का प्रथम सुल्तान था, जिसने हिन्दू त्योहरों (होली, दीपावली) में भाग लिया। दिल्ली के प्रसिद्ध सूफ़ी शेख़ 'शिहाबुद्दीन' को 'दीवान-ए-मुस्तखराज' नियुक्त किया तथा शेख़ 'मुईजुद्दीन' को गुजरात का गर्वनर तथा 'सैय्यद कलामुद्दीन अमीर किरमानी' को सेना में नियुक्त किया। शेख़ 'निज़ामुद्दीन चिराग-ए-दिल्ली' सुल्तान के विरोधियों में एक थे।
शासनकाल का अन्तिम समय :
अपने शासन काल के अन्तिम समय में जब सुल्तान मुहम्मद तुग़लक़ गुजरात में विद्रोह को कुचल कर तार्गी को समाप्त करने के लिए सिंध की ओर बढ़ा, तो मार्ग में थट्टा के निकट गोंडाल पहुँचकर वह गंभीर रूप से बीमार हो गया। यहाँ पर सुल्तान की 20 मार्च 1351 को मृत्यु हो गई।
- उसके मरने के पर इतिहासकार बरनी ने कहा कि, “सुल्तान को उसकी प्रजा से और प्रजा को अपने सुल्तान से मुक्ति मिल गई।”
- इसामी ने सुल्तान मुहम्मद बिन तुग़लक़ को इस्लाम धर्म का विरोधी बताया है।
- डॉ॰ ईश्वरी प्रसाद ने उसके बारे में कहा है कि, “मध्य युग में राजमुकुट धारण करने वालों में मुहम्मद तुग़लक़, निःसंदेह योग्य व्यक्ति था।
- मुस्लिम शासन की स्थापना के पश्चात् दिल्ली के सिंहासन को सुशोभित करने वाले शासकों में वह सर्वाधिक विद्धान एवं सुसंस्कृत शासक था।
- ” उसने अपने सिक्कों पर “अल सुल्तान जिल्ली अल्लाह”, “सुल्तान ईश्वर की छाया”, सुल्तान ईश्वर का समर्थक है, आदि वाक्य को अंकित करवाया। मुहम्मद बिन तुग़लक़ एक अच्छा कवि और संगीत प्रेमी भी था।


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