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छत्तीसगढ़ का मध्यकालीन इतिहास((Medieval History of Chhattisgarh) : कल्चुरियों की शासन प्रणाली


kalchuriyo ki shasan pranali

कल्चुरियों की शासन प्रणाली(The System of Governance of Kalchuriyo) 

  1. छत्तीसगढ़ में कल्चुरियों की प्रशासन राजतंत्रात्मक थी। प्रशासन करने के लिए राजा को अमात्यो की सहायता प्राप्त थी।
  2. कल्चुरी शासको ने प्रदेश में सर्वाधिक अवधि तक शासन करके मजबूत शासन व्यवस्था की स्थापना की थी। इनकी प्रशासन व्यवस्था को कई वर्गों में बांटा गया है।
  3. कल्चुरियों की राजकीय भाषा संस्कृत थी।

प्रशासन:

कल्चुरियों ने प्रदेश में एक लोकप्रिय विकेन्द्रीकृत शासन व्यवस्था स्थापित की थी,जिसका प्रमुख राजा होता था।इनके द्वारा प्रशासनिक पदों में स्थानीय लोगो को नियुक्त किया जाता था।

  1. राष्ट्र - राजा राष्ट्र का प्रमुख होता था।
  2. विषय - विषयपति
  3. मंडल - यह प्रशासन की सबसे बड़ी इकाई थी।इसके प्रमुख को मांडलिक/महामंडलेशवर कहा जाता था।
  4. गढ़ -  एक गढ़ 84 गांवों का समूह होता था। 7 बरहो का एक गढ़ बनता था। इसके प्रमुख को दीवान कहते थे।
  5. बरहों - यह प्रशासन की सबसे छोटी इकाई होती थी। इसके प्रमुख को गोंटिया कहते थे।

कलचुरिकालीन अधिकारी गण/मंत्रीगण

  1. महामंत्री - सर्वप्रमुख अधिकारी होता था ,जो राजा का प्रशासनिक अधिकारी होता था। इस पद पर युवराज आसीन होते थे।
  2. महामात्य - यह प्रशासन का प्रमुख मंत्री होता था।
  3. महासंधिविग्रहिका - विदेश मंत्री 
  4. महापुरोहित- राजगुरु
  5. महाप्रतिहार - अंगरक्षक
  6. महाप्रभात - राजस्व प्रबंधक 
  7. महाध्यक्ष -सचिवालय प्रमुख 
  8. शोल्किक - कर सग्रहण अधिकारी 
  9. पुरप्रधान- नगर प्रमुख अधिकारी 
  10. ग्रामकुट - ग्राम प्रमुख अधिकारी 
  11. महाकोटपाल -दुर्ग/किले की रक्षा करने वाला 
  12. ग्रामगामिक -यातायात अधिकारी 
  13. महासेनापति - सेना प्रमुख 
  14. दण्डनायक/दण्डपाशिक  - पुलिस विभाग का प्रमुख   

प्रशासनिक अधिकारी 

पुलिस व्यवस्था:

  1. दण्डनायक/दण्डपाशिक  - पुलिस विभाग का प्रमुख /सर्वोच्च पुलिस अधिकारी
  2. दुष्ट साधक -  चोर को पकड़ने वाला।
  3. चाट - लोगो की संपत्ति की रक्षा करने वाले पुलिस
  4. भाट - शांति व्यवस्था बनाने का कार्य 

न्याय व्यवस्था: 

  1. दाण्डिक - न्याय अधिकारी 

राजस्व व्यवस्था: 

  1. कल्चुरी शासको की आय का प्रमुख स्त्रोत कराधान था। जिसका महाप्रभात होता था। यह माप करवाकर लगान निर्धारित करता था।
  2. प्रमुख कर  - भूमिकर(प्रमुख ),सब्जियाँ कर ,बगीचा कर ,आयात-निर्यात कर ,खानकर,वनकर ,चरागाह कर ,नाव कर ,हाथी-घोड़े पर कर।
  3. मंडी पर सब्जी बेचने पर युगा(परमिट ) लेना पड़ता था। जो दिनभर के लिए होता था।

कल्चुरीकालीन सामजिक स्थिति:

  1. जीवन उच्चकोटि का था।
  2. वर्ण व्यवस्था को स्थान प्राप्त था।
  3. ब्राह्मण,क्षत्रिय ,वैश्य का उल्लेख मिलता है किन्तु शूद्र का उल्लेख नहीं है।
  4. ब्राह्मण - पठन-पाठन ,राजकीय धर्म में भाग लेते थे।
  5. पुरुषोत्तम व गंगाधर जैसे विद्वान मंत्री थे।
  6. स्त्रियाँ को उच्च स्थान प्राप्त था।वे कामकाज में भाग लेती थी।
  7. बहुपत्नी व सतीप्रथा जैसी कुरीतियाँ का प्रचलन था।

जातियां:

  1. 43 प्रकार की वन्य जातियां  पाई जाती थी।
  2. गोंड सबसे बड़ी जनजाति थी।

आर्थिक स्थिति:

  1. आर्थिक स्थिति समृद्ध थी।
  2. राजा की आय का मुख्य साधन भूमिकर था।
  3. नए नगरों का निर्माण हुआ - रतनपुर ,जांजगीर,रायपुर ,तखतपुर ,राजपुर आदि।

धार्मिक व्यवस्था: 

  1. महापुरोहित - राजगुरु(दान पत्रों में इस अधिकारी का उल्लेख मिलता है) 
  2. धर्म -शैव 
  3. कुलदेवी - गजलक्ष्मी 

कल्चुरी वंश के अधिकांश शासको ने अपनी मुद्रा में ॐ  नमः शिवाय उत्कीर्ण  करवाया।

यातायात प्रबंध: 

  1. गमागमिक - यातायात अधिकारी 

स्थानीय प्रशासन: 

  1. पंचकुल - स्थानीय कामकाज के संचालन हेतु कल्चुरी शासको ने बनाई थी। इसमें पांच/दस  सदस्य होते थे इन सदस्यों को महत्तर कहा जाता था। इनके प्रमुख को महत्तम कहते थे। महत्तर का चुनाव गांव के लोग करते थे।
  2. पुरप्रधान - नगर प्रमुख 
  3. ग्रामीण प्रमुख - गोटिया के अधीन होते थे।

कलचुरिकालीन साहित्य एवं भाषा 

1. रेवाराम बाबू(1850 - 1930 ) :

  1. ये हिंदी ,संस्कृत और उर्दू के विद्धान थे।
  2. प्रमुख रचना - विक्रम विलास ,रामायण दीपिका सार, कृष्ण लीला का भजन ,माता का भजन ,गीता माधव(महाकाव्य),गंगा लहरी ,नर्मदा कंटक ,दोहावली ,रत्न परीक्षा ,तारीख-ऐ -हैहयवंशीय ,रामश्वमेघ आदि।

2. गोपालमिश्र(1660 - 1761) :

  1. खूब तमाशा ,जेमिनी  ,चिंतामणि ,सुदामा चरित्र ,रामयप्रताप(अपूर्ण) आदि।

3. माखन मिश्र : 

  1. रामायणप्रताप(पूर्ण की)

4. विशदत्त शास्त्री :

  1. रतनपुर आख्यान , इतिहास समुच्चय। 

 

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