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छत्तीसगढ़ का मध्यकालीन इतिहास : कवर्धा के फणिनागवंश

kawardha ka faninagvansh

कवर्धा के फणिनागवंश(11वी शताब्दी से 14वी शताब्दी तक)

  1. शासन क्षेत्र - कवर्धा
  2. संस्थापक - अहिराज
  3. अभिलेख - मंडवा महल शिलालेख ,छपरी अभिलेख
  4. इस वंश ने कल्चुरियों के अधीन शासन किया।

फणिनागवंश के प्रमुख शासक

गोपालदेव:

  1. मंडवा अभिलेख में 6 वे राजा के रूप में उल्लेख मिलता है।
  2. कल्चुरी शासक जाजल्यदेव प्रथम के अधीन शासन किया।
  3. गोपालदेव ने 1089 ई(11वी शताब्दी) में कवर्धा के छपरी ग्राम में भोरमदेव मंदिर का निर्माण करवाया। भोरमदेव को छत्तीसगढ़ का खजुराहो भी कहा जाता है। भोरमदेव एक आदिवासी देवता है। यह मंदिर नागर शैली में निर्मित है।
  4. गोपालदेव के सहयोगी लक्षमणदेवराय थे।

रामचंद्रदेव:

  1. छपरी से प्राप्त प्रतिमा में राजा  लक्ष्मणदेव व उसके पुत्र राम का उल्लेख मिलता है।
  2. फणिनागवंश के रामचन्द्रदेव 24 वे क्रम के राजा थे।
  3. रामचंद्र का विवाह कल्चुरी वंश की राजकुमारी अम्बिका देवी से मंडवा महल में हुआ था।
  4. 1349 ई. में मंडवा महल और छेरकी महल का निर्माण करवाया जो विवाह का प्रतीक है।
  5. कवर्धा महल के वास्तुकार महाराजा धर्मराज सिंह थे। इस महल के प्रथम गेट को हाथी गेट या हाथी दरवाज़ा कहा जाता है।

मोनिंगदेव:

  1. इस वंश के अंतिमशासक थे।
  2. रायपुर के कल्चुरी शासक ब्रह्मदेव ने मोनिंगदेव को पराजित किया था।

नोट:-

  1. 18वी शताब्दी में भारतीय पुरातत्व विभाग के प्रथम महनिदेशक अलेक्ज़ेंडर कनिंघम सर्वप्रथम भोरमदेव पहुंचे थे।
  2. छेरका महल एक शिव मंदिर है।

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