Ticker

5/छत्तीसगढ़ की सामान्य जानकारी/ticker-posts

भारत का मध्यकलीन इतिहास : दिल्ली सल्तनत का खिलजी वंश (1290-1320 ई. )

sirri-forl-khalji-vansh
सिर्री का किला 

खिलजी वंश :  1290-1320 ई. 

1. जलालुद्दीन फिरोज खिलजी :1290-96 ई.

  1. खिलजी वंश का संस्थापक मलिक फ़िरोज़ था जिसने भारत में अपनी सत्ता स्थापित करने के बाद जलालुद्दीन की पदवी धारण कर ली। इसने बलबन (इल्बरी तुर्क) के शासनकाल में एक अच्छे सेनानायक के रूप में प्रसिद्दी प्राप्त की  थी। उसने कई अवसरों पर मंगोल आक्रमणकारियों का मुकाबला किया और सफलता प्राप्त की। 
  2. 13 जून, 1290 ई को कैकुबाद द्वारा निर्मित किलोखरी के महल में जलालुद्दीन ने अपना राज्याभिषेक करवाया और सुल्तान बन गया। इसने अपनी राजधानी किलोखरी को बनाई । 
  3. जब वह सुल्तान बना तो उसके उम्र 70 वर्ष थी, अतः उसकी बाह्रा नीतियां अपेक्षाकृत नरम थी। क्षेत्रीय प्रसार के कार्यक्रम को कार्यान्वित करने के लिए जलालुद्दीन खिलजी के पास न तो इच्छाशक्ति थी और न ही संसाधन। 

उसके छ: वर्ष के शासन को सुल्तान की नीतियों तथा उसके समर्थको के बीच सामंजस्य बनाए रखने के आंतरिक कलह ने मानो जकड लिया था। जलालुद्दीन का राजवंश से कोई सम्बन्ध नहीं था और दिल्ली की जनता जो एक लम्बे समय से इनके पूर्व के शासको (इल्बरी तुर्क) के शासन से परेशान थी, जलालुद्दीन और अन्य के शासन करने के अधिकार को स्वीकार करने को तैयार नहीं थी। वस्तुत: दिल्ली सल्तनत को उस समय जलालुद्दीन जैसे उदार शासक की आवश्यकता नहीं थी बल्कि एक कठोर और अनुशासनप्रिय शासक की जरुरत थी।

जलालुद्दीन की नीति तुर्की सरदारों एवं बलबन के सम्बन्धियों के प्रति संतुष्ट करने की थी। जो जिस पद पर था, उस उसने बना रहने दिया। साम्राज्य-विस्तार में भी उसे कोई सफलता नहीं मिली तथा पर उसका अभियान विफल रहा और मंगोलों के साथ उसने संधि कर ली। इल्बरी सामन्तो को हटाने के लिए उसने कोई प्रयास नहीं किया।

विद्रोहियों के प्रति जलालुद्दीन ने दुर्बल नीति अपनाई और कहा “मै एक वृद्ध मुस्लमान हू और मुसलमानों का रक्त बहाने की मेरी आदत नहीं है।”

जलालुद्दीन के समय 1292 ई में अब्दुला के नेतृत्व में मंगोलो ने पंजाब पर आक्रमण किया ,परन्तु जलालुद्दीन ने उन्हें सिंधु नदी के तट पर परास्त किया।  इस पराजय के बाद चंगेज खां के इक वंशज उलूग ने अपने 4000 समर्थको के साथ इस्लाम स्वीकार कर भारत में रहने का निश्चय किया।  

जलालुद्दीन ने इस कदम का स्वागत किया तथा अपनी एक पुत्री का विवाह उलूग से करा दी।  दिल्ली के निकट वर्तमान मंगोलपुरी में उसे रहने की अनुमति दे दी। यही मंगोल आगे नवीन मुसलमान कहलाये। 

दक्षिण भारत पर प्रथम आक्रमण :

  1.  जलालुद्दीन का भतीजा व दामाद अली गुर्साप्प(अलाउद्दीन खिलजी) कड़ा व मानिकपुरी का सरदार था। 
  2. अली गुर्साप्प ने बिना जलालुद्दीन के अनुमति से 1292 ई में मालवा में स्थित भिलसा पर आक्रमण कर वहां से लाइट हुए धन को जलालुद्दीन को सौंप दिया। इससे प्रसन्न होकर जलालुद्दीन ने उसे अवध का सूबेदार नियुक्त कर दिया। 

1296 ई में अलाउद्दीन ने बिना सुल्तान की अनुमति लिए महाराष्ट्र स्थित देवगिरि पर आक्रमण कर वहां के शासक रामचन्द्रदेव को पराजित किया।  अलाउद्दीन को इस अभियान में अत्यधिक संपत्ति प्राप्त हुई। 

देवगिरि के धन को देने व बिना आक्रमण के अनुमति के आक्रमण करने पर क्षमा -याचना हेतु अलाउद्दीन खिलजी ने सुल्तान को अकेले मिलने के लिए बुलाया। गंगा नदी के तट पर अलाउद्दीन के संकेत पर जलालुद्दीन का सर काट दिया गया। इस प्रकार 1296 ई में अलाउद्दीन खिलजी दिल्ली सल्तनत का सुल्तान बना। 

2. अलाउद्दीन खिलजी : 1296 – 1316 ई.

  1. अलाउद्दीन खिलजी के पिता का नाम शिहाबुद्दीन खिलजी था जो जलालुद्दीन खिलजी का भाई था। जलालुद्दीन खिलजी ने अपनी पुत्री का विवाह अलाउद्दीन खिलजी से किया।
  2. भिलसा, चन्देरी एवं देवगिरी पर सफल अभियानों से अलाउद्दीन खिलजी को अपार धन प्राप्त हुआ।
  3. 1296 ई में अलाउद्दीन खिलजी ने जलाली परिवार के विरुद्ध सेना  मुल्तान भेजी तथा जलालुद्दीन के परिवार के सदस्यों की हत्या कर दी गई । 

अलाउद्दीन का उत्तरी अभियान :

1. गुजरात अभियान :

  1. अलाउद्दीन का प्रथम सैन्य अभियान 1299 ई. में गुजरात के विरूद्ध था।
  2. गुजरात कृषि व्यापार दोनों ही दृष्टि से एक समृद्ध क्षेत्र था। गुजरात के बंदरगाह से घोडों का व्यापार  होता था। 

 इस अभियान का नेतृत्व उलुग खां और नुसरत खां ने किया। इसमें गुजरात का बघेल राजपूत रायकरन(कर्णदेव-3) पराजित हुआ। रायकरन बघेल ने भागकर अपनी पुत्री देवल देवी के साथ देवगिरि के शासक रामचन्द्रदेव के यहां शरण ली। किन्तु  रायकरन बघेल की पत्नी कमला रानी को पकड़ लिया गया तथा उसे अलाउद्दीन के पास भेज दिया गया। अलाउद्दीन ने उसके साथ शादी कर ली और उसे मलिका-ऐ-जंहा बनाया।  

  1. इस अभियान के दौरान अलाउद्दीन की सेना ने सूरत ,सोमनाथ ,कैम्बे (खम्भात) बंदरगाह को लुटा। सोमनाथ मंदिर को पुनः नष्ट कर दिया गया। यही पर नुसरत खां ने  मलिक काफूर नामक एक अबीसीनियाई हिजड़े को ख़रीदा। 
  2. मलिक काफूर को 1000 दीनार में खरीदा गया था इसी कारण उसे हजार दीनारी भी कहा जाता था।

 2. रणथम्भौर अभियान:1300 -1301 ई. 

 रणथम्भौर अभियान की पूर्व पीठिका गुजरात अभियान में ही तैयार हो गई थी।  युद्ध के माल को बॅटवारे को लेकर कुछ मंगोल सैनिक झड़प पड़े और भागकर रणथम्मौर में शरण ली। अलाउद्दीन खिलजी ने रणथम्मौर के शासक हम्मीरदेव के पास उन सैनिको को वापस करने का सन्देश भेजा ,परन्तु हम्मीरदेव ने उन सैनिको को वापस नहीं किया। 

1300 ई में अलाउद्दीन ने नुसरत खां के अधीन एक सेना रणथम्मौर भेजी परन्तु नुसरत खां मारा गया। फिर अलाउद्दीन ने स्वयं अभियान किया। राणा हम्मीर देव के प्रधानमंत्री रणमल के  धोखा के कारण हम्मीर देव पराजित हुए एवं वीरगति को प्राप्त हुए।

हम्मीर देव की मृत्यु के बाद हम्मीर देव की पत्नि रंगदेवीऔर रणथम्भौर की राजपूत महिलाओं ने जौहर व्रत किया। राजस्थान में जौहर का यह प्रथम साक्ष्य था।

क्या था जौहर ?

जौहर के दौरान एक अग्निकुंड बनाया गया था। यदि राजा युद्ध में मारा जाता था, तो रानी और अन्य महिलाएं अपने आत्मसम्मान और सम्मान की रक्षा के लिए उस अग्नि कुंड में कूदकर आत्म हत्या कर लेती थीं। और उसके अभिमान और सत्व की रक्षा करते थे। युद्ध में जाते समय पुरुषों द्वारा भगवा कपड़े पहने जाते थे, इसे भगवा कहा जाता था।

आमिर खुसरो इस अभियान के दौरान अलाउद्दीन के साथ था ,उस  जौहर व्रत का चित्रण अपनी रचना आशिका में किया है। 

2. चित्तौड़गढ़ पर अभियान:1303 ई. 

  1. चित्तौड़गढ़ का किला सामरिक महत्व का था।  1303 ई. अलाउद्दीन ने चित्तौड़गढ़ का  अभियान किया। इस युद्ध में रतनसिंह वीरगति को प्राप्त हुए एवं रानी पद्मिनी ने जौहर किया। इस युद्ध में चित्तौड़गढ़ के दो बहादुर सैनिक गोरा और बादल वीरगति को प्राप्त हुए थे।
  2. अलाउद्दीन ने चित्तौड़ का खिज्राबाद रख दिया तथा अपने पुत्र खिज्र खां को नियुक्त किया। 
  3. मलिक मुहम्मद जायसी की रचना   पद्मावत् के अनुसार चित्तौड़ के राजा रतनसिंह की रानी पद्मिनी(पद्मावती) को प्राप्त करने के लिए अलाउद्दीन खिलजी ने आक्रमण किया।

3. मालवा पर अभियान: 1305 ई. 

इस अभियान का नेतृत्व आइनुलमुल्क मुल्तानी ने किया। मालवा का शासक महलक देव भाग गया एवं मालवा भी सल्तनत का हिस्सा बन गया। इसी अभियान के दौरान उज्जैन ,धारानगरी ,चंदेरी आदि को भी जीत लिया गया। 

4. सिवाना पर अभियान: 

सिवाना के शासक सातलदेव एवं अलाउद्दीन खिलजी के मध्य युद्ध हुआ। इस युद्ध का नेतृत्व कमालुद्दीन कुर्ग ने किया। युद्ध में सातलदेव वीरगति को प्राप्त हुए एवं राजपूत स्त्रियों ने जौहर किया। अलाउद्दीन ने इस दुर्ग का नाम खैराबाद रख दिया। कमालुद्दीन कुर्ग को किले का संरक्षक नियुक्त किया।

5. जालौर पर अभियान

जालौर के शासक कान्हदेव सोनगरा एवं अलाउद्दीन खिलजी के मध्य युद्ध हुआ जिसका नेतृत्व भी कमालुद्दीन कुर्ग ने किया। कान्हदेव वीरगति को प्राप्त हुआ।

अपनी विजयों से अलाउद्दीन का मनोबल बहुत बढ़ गया।  वह अपनी तुलना पैगम्बर मुहम्मद से करने लगा। उसने अपने सामने दो लक्ष्य रखे 

  1. सिकंदर की तरह विजय प्राप्त करना। 
  2. नया धर्म चलाना। 

अलाउद्दीन ने अपने सिक्को पर सिकंदर -ए-सानी भी अंकित करवाया ,परन्तु दिल्ली के कोतवाल तथा उसके मित्र अलाउलमुल्क ने उसे अपने लक्ष्यों को छोड़ने का परामर्श दिया और बताया कि अभी भारत का बहुत सा क्षेत्र अविजित है तथा उसके पास अरस्तु जैसा वजीर भी नहीं है। ऐसे में विश्व विजय की बात करना गलत होगा। दूसरे लक्ष्य के संबंध में कहा कि नया धर्म चलाना पैगम्बर का काम है न कि सुल्तान का। 

अलाउद्दीन का दक्षिणी  अभियान :

  1. अलाउद्दीन ने उत्तरी राज्यों और दक्षिणी राज्यों के विरुद्ध अलग-अलग नीति अपनाई। 
  2. उत्तरी राज्यों को जीतकर उसे उन्हें अपने साम्राज्य में शामिल कर लिया।
  3. दक्षिणी राज्यों को जीतकर उनके राज्यों को पुनः वापस कर उनसे केवल वार्षिक राजस्व प्राप्त किया गया। 
  4. इस प्रकार अलाउद्दीन खिलजी कि दक्षिण विजय नीति कि तुलना समुद्रगुप्त कि दक्षिण विजय नीति से की जाती है। 

1. देवगिरी द्वितीय अभियान(महाराष्ट्र): 1306 ई. 

  1. यहां का शासक यादव वंशीय रामचंद्र देव था। अलाउद्दीन ने 1306 ई में मालिक काफूर के नेतृत्व में देवगिरि के विरुद्ध सेना भेजी। मालिक काफूर को सफलता प्राप्त हुई। रायकरण बघेल व रामचंद्र देव पराजित हुए। 
  2. देवल देवी और रामचंद्र देव को दिल्ली भेज दिया गया ,जहां देवल देवी का विवाह खिज्र खां से करावा दिया गया तथा रामचन्द्रदेव के प्रति सम्मानपूर्ण व्यवहार किया गया। रामचन्द्रदेव को रायकरण  की उपाधि दी गई व पुनः देवगिरि पर शासन करने का अधिकार दे दिया गया। 
  3. रामचन्द्रदेव ने भी वार्षिक राजस्व व आजीवन साथ देने का वादा किया। 

2. वारंगल (तेलंगाना) अभियान:1310 ई.

इस अभियान का नेतृत्व मलिक काफूर ने किया एवं देवगिरी के शासक रामचन्द्र ने मलिक काफूर का पूरा सहयोग किया। वारंगल के शासक  प्रतापरुद्र दिवतीय  बिना युद्ध किए अधीनता स्वीकार कर ली एवं प्रतीक के रूप में सोने की एक मुर्ति जिसके गले में सोने की जंजीर डालकर आत्मसमपर्ण स्वरुप अलाउद्दीन के पास भेजी। प्रतापरुद्र दिवतीय  ने  वार्षिक राजस्व व आजीवन साथ देने का वादा किया। वारंगल के शासक प्रताप रूद्र देव ने हाथी, घोड़े, रत्न, सौना, चांदी आदि दिए, कोहिनूर हीरा यहीं से मलिक काफूर ने प्राप्त किया।

मालिक काफूर को वारंगल से बहुत सारा धन प्राप्त हुआ ,जिसमे विश्व प्रसिद्ध कोहिनूर हीरा भी था ,जो वारंगल के गोलकुंडा ख़ान से निकला था।  इस हीरे का उल्लेख खाफी खां ने भी किया है। 

कोहिनूर हीरा 

कोहिनूर हीरा भारत के आंध्र प्रदेश राज्य के गुंटूर जिले में स्थित गोलकोंडा की खानों से प्राप्त किया गया था। इसे नादिरशाह द्वारा कोह-ए-नूर नाम दिया गया था। वर्तमान में, कोहिनूर हीरा ब्रिटिश शाही परिवार का है। लंदन टॉवर लंदन के केंद्र में टेम्स नदी के किनारे पर एक शानदार किला है, जो विलियम कॉकर द्वारा 1078 में बनाया गया था। शाही परिवार इस किले में  निवास नहीं करते है। इस किले  में शाही रत्न  संरक्षित हैं, जिसमें कोहिनूर हीरा भी शामिल है।

3. होयसल अभियान:1311 ई.

यह का शासक होयसल वंशीय वीर बल्लाल तृतीय था। द्वारसमुद्र का वर्तमान नाम हलेबिड है। 1311 ई में मालिक काफूर ने बीरबल्लाल तृतीय को पराजित किया। बीरबल्लाल तृतीय को दिल्ली भेज दिया गया। अलाउद्दीन खिलजी ने बीरबल्लाल तृतीय को पुनः द्वारसमुद्र का शासक मन लिया। बदले बीरबल्लाल तृतीय ने वार्षिक कर देने का वादा किया। 

4. मदुरा(केरल):1311 ई. 

मदुरा को माबर प्रदेश भी कहा जाता था। यहां पांडय वंश का राज्य था। पांडय वंशीय सुन्दर पांडय तथा वीर पांडय नामक दो भाइयों के मध्य उत्तराधिकारी का संघर्ष चल रहा था। 1311 ई में मालिक काफूर ने पांडय राज्य पर हमला किया ,पर दोनों भाई फरार हो गए। मदुरा में आक्रमण के बावजूद दोनों भाइयों को पकड़ा न जा सका।  इस प्रकार पांडय राजाओ ने अलाउद्दीन की अधीनता स्वीकार नहीं कराई जा सकी। 

  1. मदुरा आक्रमण के दौरान काफूर न इ रामेश्वरम तक आक्रमण किया तथा वहां रामेश्वरम मंदिर को तोड़कर मस्जिद का निर्माण करवाया। 
  2. 1311 ई काफूर अपार संपत्ति लेकर वापस उत्तर भारत पंहुचा। धन की दृष्टि से यह अभियान सबसे सफल था। 

5. देवगिरी पर तृतीय आक्रमण: 1313 ई. 

रामचंद्र देव के पुत्र सिंघण देव ने सल्तनत की अधीनता के सभी संकेतों को समाप्त कर दिया जैसे ही वह सिंहासन पर बैठा और एक स्वतंत्र शासक की तरह काम करने लगा। मलिक काफूर को हमला करने के लिए भेजा गया था और सिंघण देव को हराया गया था और सिंघण देव युद्ध में मारे गया । देवगिरि के अधिकांश भाग को दिल्ली सल्तनत में मिला लिया गया। 1315 ई में  रामचंद्र के दामाद हरपाल देव(यादव वंश ) को गद्दी पर बिठाया गया। इसके बाद काफूर वापस लौट गया।  । इस तरह अलाउद्दीन का विजय अभियान पूरा हुआ। 

मंगोल आक्रमण :

  1. अलाउद्दीन के कल में सबसे ज्यादा मंगोल आक्रमण (1296 ई ,1299 ई ,1303 ई ,1307 -08 ई ) हुए। 
  2. 1299 ई. के अंत में कुतलुग ख्वाजा के नेतृत्व में मंगोल सेना ने आक्रमण किया। 
  3. 1303 ई. में तार्गी के नेतृत्व में पुनः मंगोल आक्रमण हुआ।  उस समय अलाउद्दीन चित्तौड़ के घेरे से वापस दिल्ली पंहुचा ही था। अलाउद्दीन ने दिल्ली स्थित सिरी को अपनी राजधानी बनाई और किलेबंदी की।  इस प्रकार उसने मंगोलो को वापस जाने के लिए मजबूर किया। मंगोलो के विरुद्ध सफलता में सेनानायक मालिक काफूर और गाजी मालिक का प्रमुख योगदान था। 

अलाउद्दीन के विरुद्ध विद्रोह 

अलाउद्दीन के विरुद्ध कई विद्रोह हुए ,जिनमे सबसे सशक्त विद्रोह हाजी मौला का विद्रोह था। हाजी मौला दिल्ली के पुराने कोतवाल फखरुद्दीन का सेवक था। अलाउद्दीन के समय दिल्ली के कोतवाल अलाउलमुल्क की मृत्यु के बाद तिमिरजी को नया कोतवाल बना दिया गया था। हाजी मौला जो स्वयं कोतवाल बनना चाहता था ,तिमिरजी की हत्या करवा दी  तथा दिल्ली के लाल महल पर कब्ज़ा कर लिया ,किन्तु इस विद्रोह को कुचल दिया गया। 

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ