गुलाम वंश
गयासुद्दीन बलबन : 1266 -1286 ई.
बलबन का पूरा नाम बहाउद्दीन उर्फ़ गयासुद्दीन बलबन था। वह इल्बरी तुर्क था। इल्तुमिश ने ग्वालियर विजय के पश्चात उसे ख़रीदा था। इस प्रकार वह इल्तुमिश का दास था। अपने कार्यों के आधार पर बलबन प्रत्येक सुल्तान के काल में विशेष पदों पर आसीन हुआ।
- इल्तुतमिश के समय - खासदार
- रजिया के समय - अमीर-ए-शिकार
- बहरामशाह के समय - अमीर-ए-आखुर(अश्वशाला का प्रधान)
- मसूदशाह के समय - अमीर-ए-हाजिब(विशेष सचिव)
- नासिरूद्दीन महमूद के समय - नायब-ए-मुमालिकात(सुल्तान का संरक्षक)
बलबन का राजत्व का सिद्धान्त :
- राजगद्दी प्राप्त करने के उपरांत बलबन ने सुल्तान की प्रतिष्ठा और शक्ति को बढ़ाने एवं समस्त अधिकारों को अपने हाथो में केंद्रित करने का प्रयास किया।
- बलबन ने अपने आप को नियामत-ए-खुदाई (ईश्वर द्वारा प्रदत्त ) कहा तथा पृथ्वी पर ईश्वर की छाया बताते हुए जिल्ले इलाही की उपाधि धारण की। उसके अनुसार सुल्तान का स्थान पैगम्बर के पश्चात है।
बलबन के राजत्व सिद्धान्त की दो विशेषताएं थी।
- सुल्तान का पद ईश्वर के द्वारा प्रदान किया होता है।
- सुल्तान का निरंकुश होना आवश्यक है।
बलबन ने अपने दैनिक व्यवहार को अत्यंत गंभीर बताते हुए अकेले रहना शुरू कर दिया ,मदिरा पान तथा छोटे सरदारों और अमीरो से मिलना बंद कर दिया। उसने दरबार के सभी अमीरो को अनुशासित कर दरबार में हंसने व मजाक करने पर प्रतिबंध लगा दिया।,वह स्वयं भी गंभीर मुद्रा में रहता था।
इतिहासकार आर पी त्रिपाठी ने लिखा है की बलबन एक उत्तम अभिनेता था और अपने दर्शको को आधुनिक फ़िल्मी सितारों की भांति मंत्रमुग्ध रखता था।
- बलबन ने ईरानी परम्परा के अनुसार अपने दरबार में भी सिजदा(झुककर सलाम करना) एवं पाबोस (लेटकर मुख से सुल्तान के चरण को चूमना) की पध्दति लागु की। नवरोज त्यौहार भी मनाना शुरू किया।
- बलबन ने रक्त की शुद्धता पर देते हुए स्वयं को फिरदौसी द्वारा लिखित शाहनामा के सुरवीर अफ्रीसीयाब के वंशज का घोषित किया।
- निम्न कुल के व्यक्ति के लिए शासन के दरवाज़े बंद कर दिए। उसी प्रकार बलबन ने चहलगानी की शक्ति को नष्ट करने के लिए अपने वजीरों की हत्या करावा दी। तुर्क-ए-चहलगानी को भंग कर दिया।
मंगोल समस्या का समाधान
- बलबन ने मंगोलो के खिलाफ दोहरी नीति अपनाई।
- मंगोल शासको के दरबार में अपने दूत भेजे।
- उत्तर-पश्चिम में दो सुरक्षा पंक्तियों की व्यवस्था की यहां अपने दोनों पुत्रों शहजादा मोहम्मद एवं बुगरा खां के नेतृत्व में शक्तिशाली सेना नियुक्त किया।
- आगे जब बुगरा खां को बंगाल का इक्तादार बनाया गया ,तो सम्पूर्ण उत्तरी-पश्चिमी प्रदेश का दायित्व शहजादा मोहम्मद पर आ गया।
1285 ई. में तमर के नेतृत्व में एक भयानक मंगोल आक्रमण में शहजादा मोहम्मद को जान गंवानी पड़ी।
शहजादा मोहम्मद को शहीद-ए-आजम की उपाधि दी गई । शहजादा मोहम्मद अत्यंत योग्य सेनानायक और विद्वानों का आश्रयदाता था।
आमिर खुसरो तथा हसन दहलवी ने अपना साहित्यिक जीवन उसी के संरक्षण में शुरू किया था।
मेवातियों एवं राजपूतो के विरुद्ध रक्त व लौह की नीति
मेवातियों के अनेक गिरोह दिल्ली के आसपास लूट-पाट करते थे ,जिन्हे राजपूतो का संरक्षण प्राप्त था। इसके समाधान हेतु बलबन ने यहां के जंगलो को कटवाकर किलो का निर्माण करवाया तथा अफगान सैनिको की नियुक्ति की। फिर बलबन ने विद्रोहियों पर आक्रमण करवा कत्लेआम करवाया ,जिससे शांति स्थापित हो गई। बलबन की इन क्षेत्रों की नीति को रक्त व लौह की नीति कहा गया।
बंगाल का विद्रोह (1279 -1281 ई )
- बंगाल के गवर्नर तुगरिल खां ने विद्रोह कर दिया। बलबन ने अपने पुत्र बुगरा खां के साथ बंगाल का अभियान किया। तुगरिल खां के सहयोगियों को भयंकर दंड दिया गया। बुगरा खां को बंगाल का गवर्नर बनाते हुए बलबन ने चेतावनी दी की अगर उसने भी विद्रोह किया तो अंजाम तुगरिल जैसा ही होगा। बुगरा खां इतना भयभीत हो गया की उसने शासक बनने की महत्तवाकांक्षा ही त्याग दी।
- बंगाल का अभियान बलबन का पहला ऐसा अभियान था ,जिसमें वह राजधानी से बाहर गया था।
सैन्य सुधार :
- बलबन ने एक स्वंत्रत सैन्य विभाग दिवान-ए-आरिज की स्थापना की। इस विभाग का प्रमुख इमादुलमुल्क (अहमद अयाज )को बनाया।
अन्य सुधार :
- बलबन ने एक सक्षम गुप्तचर विभाग की स्थापना की।
- बलबन ने उन सभी जगीरो की जाँच करवाई ,जो इल्तुमिश द्वारा शम्शी अमीरो को सैनिक सेवा के बदले में दी गई थी। उनमे से अनेक ऐसे व्यक्ति ,जो जागीर प्राप्त करके राज्य की सेवा नहीं करते थे जैसे -वृद्ध पुरुष ,बच्चे ,विधवा स्त्रिया। ऐसी सभी जागीरों को बलबन के द्वारा वापस लेने का आदेश दिया गया ,परन्तु दिल्ली के कोतवाल फखरुद्दीन के कहने पर उसने असहायों की जागीरों को नहीं छीनने के आदेश दिए।
कैकुबाद : 1286 -1290 ई.
- बलबल ने अपने पौत्र कैखुसरो/कायखुसरो को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया परन्तु बलबन की मृत्यु के बाद तुर्क अमीर फिर सक्रिय हो गए तथा कैखुसरो के स्थान पर बुगरा खां के पुत्र कैकुबाद को सुल्तान बनाया।
- कैकुबाद के शासन में बुगरा खां ने स्वयं को बंगाल का स्वंत्रत शासक घोषित कर दिया। कैकुबाद ने समाना से मालिक जलालुद्दीन फिरोज खिलजी को बुलाया तथा उसे राज्यपाल एवं आरिज -ए-मुमालिक नियुक्त कर शाइस्ता खां की उपाधि भी दी।
- कैकुबाद की दुर्बल शासन का फायदा उठाकर जलालुद्दीन फिरोज खिलजी ने दिल्ली पर हमला कर कैकुबाद को कैद कर लिया। कुछ समय पश्चात उसकी हत्या कर क्यूमर्स को सुल्तान बना दिया तथा उसके नाम पर शासन करता रहा।
क्यूमर्स: 1290 ई.
- कैकुबाद के तीन वर्षीय पुत्र क्यूमर्श को सुल्तान बनाया गया। क्यूमर्श का संरक्षक जलालुद्दीन खिलजी को बनाया गया। नये सुल्तान को शम्मसुद्दीन क्यूमर्स की उपाधि दी गई।
- जलालुद्दीन खिलजी ने फयूमर्स की हत्या करके 1290ई. में स्वयं को सुल्तान घोषित किया और खिलजी वंश की नींव डाली।
- क्यूमर्स गुलामवंश का अंतिम शासक था। गुलाम वंश में कुल 11 शासकों ने शासन किया।
नोट :
1. बलबनी राजवंश की स्थापना गयासुद्दीन बलबन ने की। बलबन गुलाम वंश तथा बलबनी राजवंश का महान शासक था।
इल्तुतमिश एवं बलबन का तुलनात्मक अध्ययन इस प्रकार है :
1. इल्तुतमिश - इल्तुतमिश को कुतुबुद्दीन ऐबक ने खरीदा था। वह ऐबक का दामाद व दास था।
1. बलबन - बलबन को इल्तुतमिश ने खरीदा था तथा बलबन इल्तुतमिश का गुलाम था।
2. इल्तुतमिश ने तुर्क -ए -चहलगानी/चालीसा दल का गठन किया था।
2.बलबन ने तुर्क -ए -चहलगानी/चालीसा को समाप्त कर दिया।
3.इल्तुतमिश ने बाहरी व आंतरिक समस्याओं पर नियंत्रण करके व राज्य का विस्तार किया।
3.बलबन ने आंतरिक प्रशासन पर विशेष बल देते हुए राजत्व का सिद्धांत दिया।बलबन ने साम्राज्य विस्तार नहीं किया।
4. इल्तुतमिश के समय स्थापित व्यवस्था अस्थायी थी एवं प्रभाव अल्पकालीन था।
4. बलबन ने स्थायी व्यवस्था की।


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