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CGPSC Forest Exam 2020: विधुत चुंबकीय स्पेक्ट्रम (भाग-1)



भौतिक विज्ञान भाग -2(PHYSICS)

विधुत चुंबकीय स्पेक्ट्रम 

मैक्सवेल ने जिस समय विधुत चुंबकीय तरंगो की खोज की थी ,उस समय वे केवल दृश्य प्रकाश से ही परिचित थे.19 वी सदी के अंत तक गामा किरणे ,पराबैगनी किरणे व अवरक्त किरणे की खोज कर ली गयी थी .आगे चलकर रेडियो व सूक्ष्म तरंगे अस्तित्व में आयी. इन सभी तरंगो का तरंगदैर्घ्य व गुणधर्म अलग अलग होते है .

विधुत चुंबकीय तरंगो का तरंगदैर्घ्य  के आधार पर बढ़ता क्रम 

गामा किरणे ,एक्स किरणे ,पराबैगनी किरणे ,दृश्य प्रकाश ,अवरक्त किरणे ,सूक्ष्म तरंगे ,रेडियो तरंगे 

विधुत चुंबकीय तरंगो का वर्गीकरण 

दृश्यता के आधार पर  विधुत चुंबकीय स्पेक्ट्रम  को दो भागो में विभाजित किया गया है.

1 दृश्य स्पेक्ट्रम 2 अदृश्य स्पेक्ट्रम

1 दृश्य स्पेक्ट्रम : विधुत चुंबकीय स्पेक्ट्रम  में केवल दृश्य प्रकाश ही आँख की रेटिना पर पड़ कर दिखाई देते है . दृश्य प्रकाश का तरंगदैर्घ्य 3900 - 7800 ऐंगस्ट्रम के बीच होता है जबकि नेनो मीटर में दृश्य प्रकाश का तरंगदैर्घ्य 400 - 700 नैनोमीटर के बीच होता है. न्यूटन के अनुसार दृश्य प्रकाश 7 रंगो से मिलकर बना होता है .दृश्य प्रकाश में हमें बैंगनी रंग से लेकर लाल रंग दिखलाई पड़ते है .बैंगनी रंग का तरंगदैर्घ्य  सबसे कम(400 nm) और सबसे अधिक(700 nm) तरंगदैर्घ्य  लाल रंग  के प्रकाश की होती है .

आयनीकरण क्षमता के आधार पर 

1 आयनीकारक विकिरण  2 अनआयनीकारक विकिरण  

1 आयनीकारक विकिरण:  विधुत चुंबकीय स्पेक्ट्रम में गामा एवं एक्स किरणे आयनीकरण क्षमता दर्शाती है.

2 अनआयनीकारक विकिरण: विधुत चुंबकीय स्पेक्ट्रम में गामा एवं एक्स को छोड़कर अन्य विकिरण जैसे -पराबैंगनी किरणे ,दृश्य प्रकाश ,अवरक्त किरणे ,सूक्ष्म तरंगे ,रेडियो तरंगे ,अनआयनीकरण क्षमता दर्शाती है.

गामा किरणे 

इन तरंगो की खोज हेनरी बेकुरल(फ्रांस ) ने किया था .रेडियो एक्टिवता  के पिता एवं यूरेनियम के खोजकर्ता हेनरी बेकुरल ने इन किरणों की उपस्थिति का सर्वप्रथम पता लगाया. इन तरंगो की आवृति 10 की पावर 20 Hz से 10 की पावर 18 Hz तथा तरंगदैर्घ्य 10 की पावर -14  से 10 की पावर -10 होता है 

खोजवर्ष -  1896 (पिच ब्लेड नमक अयस्क से यूरेनियम का निष्कर्षण किया )

उत्पत्ति - रेडियोएक्टिव पदार्थ से जैसे -यूरेनियम ,रेडियम 

गुण -  गामा किरणों की तरंगदैर्घ्य सबसे होने के कारन इन किरणों में सर्वाधिक ऊर्जा होती है.सर्वाधिक ऊर्जा  होने के कारण भेदन क्षमता बहुत अधिक होती है .

उपयोग - कोबाल्ट 60 नामक रेडियो एक्टिव समस्थानिक से उत्सर्जित गामा विकिरण कैंसर एवं ट्यूमर का इलाज  में उपयोगी होते है . गोल्ड 198 का उपयोग अवांछित कोशिकाओं को नष्ट करने में किया जाता है ,खाद्य पदार्थ के परिरक्षण में (जीवाणुओ को नष्ट करने हेतु )

अवशोषण -ऊपरी वायुमंडल में उपस्थित हाइड्रोजन गैस इन्हे अवशोषित कर लेती है .

हानिकारक - एटमबम  एवं  nuclear हथियार से उत्सर्जित यहाँ किरणें हड्डियों के अंदर उपस्थित बोनमेरो द्रव को नष्ट कर देती है जिससे व्यक्ति के शरीर में रक्त निर्माण नहीं होता है.जिससे  व्यक्ति की तत्काल मौत हो जाती है .

X - किरणें -  

इन तरंगो की खोज 1895 में रोंटजन ने की थी इन इन तरंगो की आवृति 10 की पावर 18  Hz से 10 की पावर 16  Hz तथा तरंगदैर्घ्य 10 की पावर -10   से 10 की पावर -8 होता है 

खोजवर्ष -  1895 (रोंटजन ने अपनी पत्नी के हाथ का  एक्सरे सर्वप्रथम 22 दिसम्बर 1895 को लिया था  )

उत्पत्ति - धात्विय लक्ष्य (भारी तत्व/उच्च गलनांक वाली धातु) पर उच्च ऊर्जा के इलेक्ट्रानो की बौछार से ये किरणें उत्पन्न होती है .

गुण- ये किरणें फोटोग्राफिक प्लेटो को प्रभावित  करती है ,ये किरणें गेसो को आयनित कर देती है .इन किरणों की भेदन क्षमता गामा किरणों से कम होती है. 

उपयोग - चिकित्सा एवं औधोगिक क्षेत्र में अनुप्रयोग ,शल्य चिकित्सा ,सी.टी  स्कैन  मेँ

हानिकारक -शरीर के अंदर जाकर मानव शरीर के WBC कोशिकाओं को नष्ट करने की क्षमता 

परबैगनी प्रकाश 

इन तरंगो की खोज जे.डबल्यू.रिटर ने की थी. इन इन तरंगो की आवृति 10 की पावर 16  Hz से 10 की पावर 14  Hz तथा तरंगदैर्घ्य 10 की पावर -8   से 10 की पावर -7 होता है 

खोजवर्ष -  1801

उत्पत्ति - सूर्य पराबैंगनी किरणों का एक  सबसे बड़ा एवं महत्त्वपूर्ण स्त्रोत है .पृथ्वी मेँ पहुंचने से पहले वायुमण्डल की परत समताप मंडल  मेँ उपस्थित ओज़ोन परत द्वारा ये विकिरण अवशोषित कर लिए जाते है.

गुण- ये किरणें प्रकाश विधुत प्रभाव दर्शाती है ,इन किरणों की भेदन क्षमता X किरणों से कम होती है. 

उपयोग - अस्पतालों मेँ रोगियों की सिकाई करने मेँ ,फिंगर प्रिंट की जाँच मेँ ,अंगो की सफाई करने मेँ ,रोगाणुओ और जीवाणुओं को नष्ट करने मेँ 

हानिकारक -पृथ्वी मेँ पहुंचने से पहले वायुमण्डल की परत समताप मंडल  मेँ उपस्थित ओज़ोन परत द्वारा ये विकिरण अवशोषित कर लिए जाते है. जिससे स्किन कैंसर होने का खतरा नहीं होता है.

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