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जलाल-उद-दीन मोहम्मद अकबर



जलाल-उद-दीन मोहम्मद अकबर 
जलाल-उद-दीन मोहम्मद अकबर  एक नाम, जो अपने आप में विरासत है, का जन्म राजा हुमायूँ और बेगम हमीदा बानो के हुआ, जब वे वर्ष 1542    ई  में निर्वासन में रह रहे थे |अकबर की रुचि सभी युद्ध तकनीकों को सीखने में थी और वह पूरी तरह से पढ़ने  और लिखने में उदासीन था | वास्तव में वह बिलकुल भी पढ़ा लिखा नहीं था फिर भी वह सभी चीजों के बारे में जानने का इच्छुक था |
 हुमायूँ की मृत्यु होने पर बैरम खाँ ने ‘कलानौर’ (गुरुदासपुर-पंजाब) में 14 फरवरी, 1556 ई. को अकबर का राज्याभिषेक कर दिया. बैरम खान सबसे वफ़ादार और योग्य सेना प्रमुख था जोकि शुरुआत में हुमायूँ के सेना में सेनापति था और उनकी मृत्यु के बाद, बैरम खान ने हेमू की बढ़ती हुई तानाशाही को समाप्त करने में अकबर की मदद की |
पानीपत का दूसरा युद्ध
बैरम की कमान में अकबर की सेना ने हेमू को 1556 ई में पानीपत के द्वितीय  युद्ध में पराजित  किया था |
यह युद्ध अकबर और हेमू के मध्य 9 नवम्बर, 1556 ई. को पानीपत के मैदान में हुआ.
आरम्भ में हेमू की सेना मुगलों पर भारी पड़ी, किन्तु दुर्भाग्यवश हेमू की आँख में तीर लग गई तथा उसकी सेना में भगदड़ मच गई.
हेमू को पकड़ कर उसका वध कर दिया गया तथा अकबर की विजय हुई तथा मुगल वंश की पुनः स्थापना की गई.
मेवात की विजय
हेमू की मृत्यु के पश्चात् बैरम खाँ ने मेवात पर विजय प्राप्त की तथा वहाँ की सारी सम्पत्ति पर अधिकार कर लिया.
सिकन्दर सूरी पर आक्रमण
सिकन्दर सूरी को पराजित करके बैरम खाँ ने 1557 ई. में मानकोट के दुर्ग पर अधिकार कर लिया.
इन विजयों के अतिरिक्त अकबर ने बैरम खाँ के संरक्षण में 1558 ई. से 1560 ई. तक अजमेर, जौनपुर तथा ग्वालियर पर भी अधिकार कर लिया.
पेटीकोट शासन (1560-64 ई.)
बैरम खाँ के पतन के पश्चात् 1560 ई. से 1564 ई. तक शासन में अकबर के सम्बन्धियों और हरम की स्त्रियों का बहुत अधिक प्रभाव रहा.
इसी शासन काल को अनेक इतिहासकारों ने ‘पेटीकोट शासन’ का नाम दिया है.

अकबर की विजयें
मालवा की विजय
1560 ई. में अकबर ने बाजबहादुर से ‘मालवा प्रदेश जीत कर पीर मुहम्मद को सौंपा.
किन्तु बाजबहादुर ने मालवा पर फिर अधिकार कर लिया. 1562 ई. में अकबर ने फिर मालवा के विरुद्ध विशाल सेना भेजी.
बाजबहादुर ने उसकी अधीनता स्वीकार कर ली और मालवा मुगल साम्राज्य का अंग बन गया.
गोंडवाना की विजय
1564 ई. में अकबर ने रानी दुर्गावती को पराजित करके गोंडवाना प्रदेश पर अधिकार कर लिया है.
चित्तौड़ की विजय
1568 ई. में अकबर ने राणा सांगा के पुत्र उदयसिंह को पराजित करके मेवाड़ के रणथम्भौर प्रसिद्ध दुर्ग चित्तौड़ को जीत लिया.
उदयसिंह की मृत्यु के पश्चात् महाराणा प्रताप ने अकबर के विरुद्ध अपना संघर्ष जारी रखा.
रणथम्भौर तथा कालिंजर की विजय
1569 ई. में अकबर ने रणथम्भौर पर आक्रमण कर दिया.
यहाँ के शासक राणा सूजान राय ने अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली.
राणा प्रताप के विरुद्ध युद्ध
मेवाड़ के राणा प्रताप ने अकबर की अधीनता स्वीकार करने से इन्कार कर दिया.
1567 ई. में राजपूतों (राणा प्रताप) तथा मुगल सेना के मध्य हल्दी घाटी का प्रमुख युद्ध हुआ.
राजपूत शक्ति को बहुत क्षति पहुंची.
किन्तु फिर भी उन्होंने मुगलों के विरुद्ध अपना संघर्ष जारी रखा और अन्त तक मुगलों की अधीनता स्वीकार नहीं की.
गुजरात की विजय
1572 ई. में अकबर गुजरात के विरुद्ध बड़ा .
यहाँ के शासक मुजफ्फर खाँ तृतीय ने उसकी अधीनता स्वीकार कर ली.
बिहार और बंगाल की विजय
1576 ई. में अकबर ने टोडरमल के नेतृत्व में बिहार तथा बंगाल के विरुद्ध सेना भेजी.
यहाँ के शासक दाऊद खाँ को पराजित करके यह प्रदेश मुगल साम्राज्य में मिला लिया गया.
काबुल की विजय
1585 ई. में अकबर ने अपने सौतेले भाई मिर्जा मुहम्मद हकीम की मृत्यु के पश्चात् काबुल पर भी अपना अधिकार कर लिया.
कश्मीर पर अधिकार
1586 ई. में अकबर ने राजा भगवानदास की सहायता से कश्मीर पर अधिकार कर लिया.
सिन्ध और कन्धार की विजय
अकबर ने 1591 ई. में सिन्ध और 1596 ई. में कन्धार पर विजय प्राप्त की.
अहमदनगर की विजय
1600 ई. में अकबर ने मुराद और खानखाना के नेतृत्व में अमदनगर के विरुद्ध सेना भेजी.
मुगल सेनाओं ने वहाँ के शासक निजाम शाह को बन्दी बना लिया और अहमदनगर पर अधिकार कर लिया.
खानदेश की विजय
1601 ई. में खानदेश के शासक मिर्जा बहादुर को पराजित करके इस पर अधिकार कर लिया गया.
इस प्रकार अकबर ने अनेक विजयें कीं तथा उसका साम्राज्य हिमालय से नर्मदा नदी तक विस्तृत हो गया.
दक्षिण भारत की विजय
(i) खानदेश(1591 ई. )-अली(स्वेच्छा से अधीनता स्वीकार की.)
(ii) दौलताबाद(1599 ई)-चाँदबीबी (.मुराद, अबुल फज़ल, अब्दुर्रहीम खानखाना एवं अकबर)
(iii) अहमद नगर(1600 ई.)- बहादुरशाह (राजकुमार दानियाल एवं अब्दुर्रहीम खानखाना)
(iv) असीरगढ़(1601 ई.)- मीरन बहादुर सम्राट अकबर)
अकबर के समय हुए विद्रोह
उजबेगों का विद्रोह
उजबेग पुराने अमीर थे.
अब्दुल्ला खाँ, खानजमाँ या अलीकुली खाँ, आसफ खाँ, बहादुर खाँ, इब्राहिम खाँ, अवध का सूबेदार खाने आलम आदि इस विद्रोह के प्रमुख नेता थे.
1564 ई. में अब्दुल्ला खाँ ने अकबर के विरुद्ध विद्रोह कर दिया.
कालान्तर में अन्य उजबेग सरदार भी उससे मिल गए.
1565 ई. में खानजमों ने भी विद्रोह कर दिया तथा आसफ खाँ भी उससे जा मिला.
अकबर ने खानजमाँ के विरुद्ध सेना भेजी, किन्तु मुगल सेना को 1565 ई. में मुँह की खानी पड़ी.
अकबर ने दूसरी बार स्वयं सेना का नेतृत्व किया, किन्तु उसे अपने भाई हकीम मिर्जा के कार्यों के कारण यह अभियान स्थगित करना पड़ा.
अपने भाई से निपटने के पश्चात् 1567 ई. में अकबर की सेनाओं ने रात के समय गंगा नदी को पार करके प्रातः ही उजबेगों पर आक्रमण कर दिया.
खानजमाँ मारा गया.
यह स्पष्ट है कि विद्रोह केवल अकबर की वीरता और उपयुक्त समय पर कार्य करने के कारण ही दब सका था.
मिर्जा वर्ग का विद्रोह
मिर्जा वर्ग के लोग अकबर के सम्बन्धी थे.
इब्राहिम मिर्जा, मुहम्मद हुसैन मिर्जा सिकन्दर मिर्जा, महमूद मिर्जा, मसूद मिर्जा आदि इस वर्ग के प्रमुख विद्रोही थे.
बादशाह के सम्बन्धी होने के कारण ये लोग कुछ विशिष्ट अधिकार चाहते थे.
अतः उन्होंने विद्रोह कर दिया.
1573 ई. तक अकबर मिर्जाओं के विद्रोह को पूर्ण रूप से कुचलने में सफल हो गया.
बंगाल एवं बिहार में हुए विद्रोह
1580 ई. में बंगाल में बाबा खाँ काकशल एवं बिहार में मासूम काबुली तथा अरव बहादुर ने विद्रोह कर दिया.
1581 ई. में राजा टोडरमल के नेतृत्व में मुगल सेना ने इस विद्रोह को को कुचला.
अफगान वलूचियों का विद्रोह
अकबर के कश्मीर अभियान के समय 1585 ई. में पश्चिमोत्तर सीमा पर अफगानों एवं बलूचियों ने विद्रोह कर दिया.
इस विद्रोह में बीरबल की हत्या कर दी गई.
राजा टोडरमल एवं राजा मानसिंह ने इस विद्रोह को कुचला..
शाहजादा सलीम का विद्रोह
सम्राट अकबर शाहजादा सलीम को बहुत लाड़-प्यार करता था.
अतः यह बिगड़ चुका था.
वह बादशाह बनना चाहता था.
1599 ई. में अकबर की आज्ञा के बिना अजमेर से इलाहाबाद चला गया तथा वहाँ स्वतन्त्र शासक के रूप में रहने लगा.
1602 ई. में अकबर ने सलीम को समझाने का प्रयत्न किया.
इस दौरान इसी संदर्भ में ओरछा के बुन्देल सरदार वीरसिंह द्वारा अबुल फजल की हत्या करवा दी गई.
1603 ई. में सलीम ने आगरा आकर अकबर से माफी मांग ली.
उसे क्षमा कर दिया गया.
अकबर ने उसे मेवाड़ को जीतने के लिए भेजा, किन्तु वह फिर अकबर की आज्ञा का उल्लंघन करके इलाहाबाद पहुंच गया.
1604 ई. में उसने फिर आगरा आकर क्षमा मांग ली तथा अकबर ने एक बार फिर उसे क्षमा कर दिया.
इसके पश्चात् सलीम ने कभी विद्रोह नहीं किया.
अकबर के महत्वपूर्ण कार्य
कार्य वर्ष
1562 ई. दास प्रथा का अन्त
1562 ई. हरमदल से मुक्ति
1563 ई. तीर्थ यात्रा कर समाप्त
1564 ई. जजिया कर समाप्त
1571 ई-. फतेहपुरसिकरी की स्थापना
1571 ई.- राजधानी आगरा से फतेहपुर सिकरी स्थानान्तरण
1575 ई-.जागीरदारी प्रथा का अन्त
1575 ई.- इबादतखाने की स्थापना
1578 ई.- इबादतखाना में सभी धर्मों को प्रवेश की अनुमति
1579 ई. -मजहर की घोषणा
1581 ई. -दीन-ए-इलाही की स्थापना
1583 ई.- इलाही संवत्’ की स्थापना
प्रशासन
अकबर को बहुत सक्षम सत्तारूढ़ तकनीक के लिए जाना जाता था | वह जिससे भी वह मिलता था उससे ज्ञान एकत्र करना चाहता था | उनका अपनी प्रजा से विनम्रता से बात करने का तरीका उनकी सबसे प्रमुख विशेषता थी |
अकबर अपनी उदारता के लिए प्रसिद्ध था  परंतु वह रणनीतिक तरीके से निरपेक्ष भी था | इतनी विशाल भूमि और विभिन्न धर्मों के देश पर शासन   उसने अपनी योग्यता के दम किया  |
अकबर के शासन में धर्म

  • अकबर कट्टर मुसलमान नहीं था बल्कि उसे सभी धर्मों के प्रति सहनशीलता के लिए जाना जाता था | इसी कारण वह लोगों के बीच प्रसिद्ध था |
  • अकबर ने कई धर्मों में विवाह किए जिसके द्वारा वह एकता और एकजुटता का संदेश देता था |
  •  “सभी की एकता” में अपने विश्वास को मजबूत करने के लिए अकबर ने दीन-ए-इलाही के सिद्धांत का प्रतिपादन किया जिसके द्वारा उसने “सभी धर्म समान हैं” के सिद्धांत को फैलाया |
  • कला व संस्कृति
  • एक समर्पित  शासक होने के साथ अकबर कला और संस्कृति का  महान संरक्षक था | वह कवियों व गायकों और कला से जुड़े लोगों के साथ का आनंद लिया करते था |

  • इसके दिल्ली में और उसके आसपास के किले  व महल, बेजोड़ कारीगरी की श्रेष्ठ कृतियाँ हैं |  उनमे से कुछ हैं फ़तेहपुर सीकरी, इलाहाबाद का किला, और आगरा का किला इत्यादि | अकबर संगीत व कविताओं का महान अनुरागी था, इसका दरबार महान कलाकारों, विद्वानों, कवियों, और गायकों इत्यादि का अनूठा मिश्रण था जोकि अकबर व उसकी सभा मे उल्लास बनाए रखते थे |

  •  संस्कृति के लिए उसके इस प्यार ने उसके दरबार को नौ रत्नों से सुशोभित किया, जिन्होनें कला और ज्ञान के क्षेत्रों में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया, वे निम्न हैं –

  • बीरबल (महेश दास ) दरबार का विदूषक
  • मियां तानसेन (तन्ना मिश्रा ) दरबार का गायक    
  • अबुल फजल (काल गणक ) जिसने अन –ए-अकबरी लिखी
  • फैज़ी (दरबार का कवि )
  • महाराजा मान सिंह ( सेना सलाहाकार )
  • फ़कीर अजीउद्दीन (सूफी गायक )
  • मिर्ज़ा अज़ीज़ कोको (गुजरात का सूबेदार )
  • टोडरमल ( वित्तीय सलाहाकर )
  • अब्दुल रहीम खान-ए-खाना ( हिन्दी छन्दों के लेखक )
  • अकबर के जीवन में अन्य विशेषताएँ
  • कुछ ओर प्रमुख आदतें  जो लोगों को राहत देतीं थीं जिसके लिए अकबर को याद किया जाता था, वे हैं :
  • अकबर के शासन काल में जज़िया कर को समाप्त कर दिया गया |
  • इसने पढे लिखे हिन्दू पंडितों को महत्वपूर्ण सरकारी पदों पर नियुक्त किया |
  • वह आम लोगों से बात करते थे व उनकी परेशानियों को दीवान-ए-आम में सुना करते थे |
  • वह हिन्दू, मुसलमान, और ईसाई विद्वानों से दीवान-ए-खास में महत्वपूर्ण मुद्दों पर बातचीत करते थे |
  • अकबर के शासन का अंत
  • 1605 में 63 वर्ष की आयु में अकबर रक्ततिसार (पेचिश) से बुरी तरह ग्रस्त हो गए जो ठीक नहीं किया जा सका और इसने अकबर का जीवन ले लिया | अकबर को सम्मानपूर्वक तरीके से आगरा के किले में दफ़ना दिया गया |

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